गेम ( लघुकथा) - भगवती प्रसाद द्विवेदी


आख़िरकार बटुक बाबू को ज़मानत नहीं मिल पाई और पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। वह पहली बार परिवार न्यायालय में दाख़िल हुए थे। इसके पहले पुलिस थाने और कोर्ट-कचहरी से उनका कभी पाला पड़ा नहीं था।
बटुक बाबू गाँव के सरकारी स्कूल के हेडमास्टर रहे और गाँव की कई पीढ़ियों को उन्होंने पढ़ाया था। सेवानिवृत्ति के बाद भी अभावग्रस्त बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देने की परिपाटी आज भी जारी थी। समूचा गाँव उन्हें 'गुरुदेव' कहकर संबोधित करता था। आज अपनी बहू ने ही उनकी छीछालेदर कर दी थी।
बहू के रूप में बटुक बाबू ने पढ़ी-लिखी दिव्या का चयन सोच-समझकर किया था। उन्होंने पहले ही दिन सहृदयता का परिचय देते हुए कहा था, "बहू दिव्या! तुम बहू के बजाय मेरी बेटी हो। इसलिए तुम स्वेच्छा से जैसा पहनो, खाओ, रहो, यहाँ कोई बंधन नहीं है। बस, दोनों कुल की मर्यादा का ख़्याल रखना।"
मगर बटुक बाबू को क्या पता था कि बहू के सरोकार किसी अन्य युवक से थे, किन्तु अपनी जाति-बिरादरी का न होने के कारण सिपाही पिता ने दबाव बनाकर जबरदस्ती उस घर की बहू बनाकर चैन की साँस ली थी। लेकिन दिव्या जब बार-बार मायके जाने लगी, तब जाकर असलियत की पोल खुली। उसे गाँव में रहना गवारा नहीं था। फिर तो बाबूजी ने दिव्या को सेवारत बेटे के साथ शहर भेज दिया था। मगर वहाँ भी उसे चैन कहाँ! छठ पूजा में जब बेटा गाँव आया, तो दिव्या ने गाँव आने से मना कर दिया था और उसके यहाँ आते ही नैहर के लिए उड़न-छू हो गई थी। तत्पश्चात् बटुक बाबू पर दहेज़ की मोटी रकम माँगने के आरोप, पति पर नशाखोरी, परस्त्रीगमन और मारपीट का आरोप और श्वसुर पर बुरी नज़र रखने एवं शीलहरण की कोशिशों की शिकायत। दोनों की ही गिरफ़्तारी। आज बाबूजी की ज़मानत की अर्जी भी ख़ारिज कर दी गई।
"क्या बेटी! एक बदनसीब बाप को यही सज़ा दी है तुमने?" दिव्या के सामने आते ही बटुक बाबू ने पूछा था, "क्या बहू के साथ अच्छा बर्ताव करने का परिणाम है यह?"
दिव्या ने आँखें नचाते हुए जवाब दिया था, "नहीं, बाबूजी! मेरे साथ आप जो गेम खेल रहे थे, उसका इनाम है यह!"
"मैं और गेम! कौन-सा गेम, बेटे?" बटुक बाबू हतप्रभ थे।
बहू ने छूटते ही कहा था, "आप ख़ुद को अच्छा साबित करने का गेम खेल रहे थे, ताकि मैं आपके झाँसे में आ जाऊँ और आप मेरे साथ मुँह काला कर सकें।"
बटुक बाबू एक ही साथ क्रोध और मर्मांतक पीड़ा से भर उठे थे। कुरते की बाँह से उन्होंने चुपके से अपनी आँखें पोंछ ली थीं और वह सिपाही के साथ चल पड़े थे। ऐसा लगा था जैसे उनके कलेजे में किसी ने बरछी घोंप दी हो। उन्होंने एक बार पीछे पलटकर देखा। दिव्या के चेहरे पर कुटिल विजयी मुसकान थिरक रही थी।


- भगवती प्रसाद द्विवेदी

लेखक परिचय : 
जन्म स्थान: बिहार (वर्तमान निवास: दानापुर, पटना)
संक्षिप्त परिचय:
भगवती प्रसाद द्विवेदी जी हिंदी और भोजपुरी साहित्य के लब्धप्रतिष्ठित कथाकार, कवि, समालोचक और लोक-साहित्य के जाने-माने विद्वान हैं। उन्होंने बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। भारत सरकार के दूरसंचार विभाग से सेवानिवृत्ति के पश्चात् वे निरंतर स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हैं।
साहित्यिक योगदान:
हिंदी और भोजपुरी में उनकी 21-21 पुस्तकें तथा बाल साहित्य की 100 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित एवं प्रशंसित हैं।
प्रमुख लघुकथा संग्रह: 'भविष्य का वर्तमान', 'थाती', 'सदी का सच' (विशेष रूप से चर्चित)।
प्रमुख कहानी संग्रह व उपन्यासिकाएंँ: 'अस्तित्वबोध', 'चीरहरण', 'फीलगुड तथा अन्य कहानियांँ', 'जिसके आगे राह नहीं', 'यातना-शिविर'।
सम्मान एवं पुरस्कार:
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 'बालसाहित्य भारती सम्मान', 'निराला पुरस्कार', 'सूर पुरस्कार'।
बिहार सरकार द्वारा 'भिखारी ठाकुर सम्मान' तथा बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् द्वारा 'विशिष्ट साहित्य-सेवा सम्मान'।
इसके अलावा 'देवपुत्र गौरव सम्मान' (इंदौर) और 'चमेली देवी महेंद्र सम्मान' (कानपुर) सहित कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से अलंकृत।
वर्तमान दायित्व:
वर्तमान में वे बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साहित्य मंत्री और अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में साहित्य-सेवा कर रहे हैं।

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