हमको आता है सलीके से मुहब्बत करना,
हमने सीखा नहीं रिश्तों में तिजारत करना।
सोचकर कदम उठाना है तुझे अब हरदम
तुझको भारी कहीं पड़ जाए न ग़फ़लत करना।
आँख में धूल न फेंको यूँ किसी के भी तुम,
जान लो हमको भी आता है सियासत करना।
मान-सम्मान तो देना नहीं आता इनको,
जानते सिर्फ़ हैं बच्चे ये हुकूमत करना।
नाम-ओ-शोहरत की ख़्वाहिश नहीं मुझको बिल्कुल,
अपने माँ-बाप की केवल है ख़िदमत करना।
ख़त्म माहौल हो दहशत का ज़माने से अब,
अम्न-ओ-चैन की ख़ातिर है इबादत करना।
'साधना' उम्र बसर प्यार से हो चाहत अपनी,
मरते दम भी नहीं हमको है बग़ावत करना।
साधना कृष्ण
शिक्षिका
हाजीपुर, बिहार