महाकवि स्वयंभू — भाषा के अप्रतिम जादूगर और अपभ्रंश-हिंदी के आदि वाल्मीकि


हिंदी साहित्य के आदिकाल की पृष्ठभूमि को निर्मित करने वाले प्रारंभिक साहित्य में जैन मत के कवियों का अवदान अद्वितीय है। इस संपूर्ण धारा के सबसे प्रतापी, सहज और विराट रचनाकार महाकवि स्वयंभू (783 ईस्वी के आसपास) माने जाते हैं। उन्हें हिंदी और अपभ्रंश साहित्य का 'प्रथम महाकवि' होने का गौरव प्राप्त है। स्वयंभू ने उस दौर में जब संस्कृत का बोलबाला था, लोक-भाषा (अपभ्रंश, जो आगे चलकर हिंदी बनी) को महाकाव्य के स्तर पर प्रतिष्ठित किया। उनकी सबसे प्रसिद्ध कालजयी रचना 'पउम चरिउ' (रामचरित) है, जिसमें राम के चरित्र को मानवीय और अत्यंत करुणामयी रूप में ढाला गया है।

आइए, आज 'बोधायन पत्रिका' के माध्यम से हम इस महान भाषा-शिल्पी के शब्द-सामर्थ्य और उनकी साहित्यिक प्रासंगिकता को गहराई से टटोलते हैं।

तुलसीदास जी से सदियों पहले, स्वयंभू ने रामकथा को 'कड़बक पद्धति' (चौपाई और दोहे का क्रम) में निबद्ध किया था। 'पउम चरिउ' में पाँच कांड (विद्याधर कांड, अयोध्या कांड, सुंदर कांड, युद्ध कांड और उत्तर कांड) हैं। इसमें सीता-निर्वासन और राम के अंतर्द्वंद्व का जो मर्मस्पर्शी चित्रण है, वह विरल है।

 पंक्तियाँ (वर्षा ऋतु में राम का विरह): 

घण गज्जहिं भुइँ लज्जहिं कंत विहूणि विहंगम कुंजहिं। 

तड़ि तड़तड़ंत भड़भड़ंत णह-यलु, एक्कली सीय कवण विधि संजहु॥

 भावार्थ: आकाश में बादल गरज रहे हैं और धरती मानो उनके वेग से काँप रही है। अपने प्रिय से बिछड़े हुए पक्षी कुंजों में व्याकुल होकर क्रंदन कर रहे हैं। आकाश में बिजली तड़-तड़, भड़-भड़ की आवाज़ के साथ चमक रही है; ऐसे भयावह माहौल में मेरी अकेली सीता किस प्रकार अपना दिल संभाल रही होगी?

स्वयंभू को भाषा का 'कविराज चक्रवर्ती' कहा जाता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में देशज शब्दों, मुहावरों और लोक-जीवन के बिंबों का ऐसा सुंदर प्रयोग किया है कि वह तत्कालीन समाज का सजीव आईना बन जाती है। उनकी छंद योजना इतनी सुरीली है कि उसे सुनते ही मन मुग्ध हो जाता है।

पंक्तियाँ (सीता की पवित्रता पर): 

सो सिय विमली गुण-रयण-णिही, पर-पुरिस-विमुही दुक्खहं सही। 

जइ पावइ अग्गि-परिक्खणउ, तइ जगु वि हसइ अणवरयउ॥ 

भावार्थ: वह सीता जो निर्मल गुणों और शील के रत्नों की खान है, जिसने पराए पुरुष की ओर कभी आँख उठाकर नहीं देखा और जो दुखों को सहने वाली है; यदि उसे भी अपनी पवित्रता के लिए अग्नि-परीक्षा देनी पड़ रही है, तो यह संसार निरंतर अपनी ही मर्यादाओं पर हंस रहा है।

साहित्यिक आलोचक मानते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने जब 'रामचरितमानस' की रचना की, तो उन्होंने स्वयंभू की 'कड़बक शैली' (7-8 चौपाइयों के बाद एक दोहा) को ही अपना आधार बनाया। इस दृष्टि से स्वयंभू केवल आदिकाल के कवि नहीं हैं, बल्कि वे समूचे हिंदी राम-काव्य के वैचारिक और शिल्पगत पुरोधा हैं।

महाकवि स्वयंभू का साहित्य हमें सिखाता है कि महान कृतियाँ लोक-भाषा के बिना संभव नहीं हैं। उन्होंने रूढ़ियों से परे जाकर पात्रों के मानवीय पक्ष को उभारा। डॉ. रामकुमार वर्मा ने ठीक ही उन्हें "अपभ्रंश का वाल्मीकि" कहा है। आज अपनी भाषा की जड़ों, उसके क्रमिक विकास और रामकथा के इस अनूठे, लोक-सम्मत रूप को समझने के लिए महाकवि स्वयंभू का अनुशीलन प्रत्येक साहित्य-प्रेमी के लिए अनिवार्य है।

साभार और संदर्भ सूची :

  • स्रोत ग्रंथ: पउम-चरिउ (मूल पाठ, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली)।

  • ऐतिहासिक संदर्भ: डॉ. रामकुमार वर्मा कृत 'हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' एवं आचार्य रामचंद्र शुक्ल कृत 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (जैन साहित्य अनुभाग)।

  • विशेष आभार: यह आलेख 'बोधायन पत्रिका' के माध्यम से हमारी भाषाई विरासत के आदि-शिल्पी और महाकवि स्वयंभू के प्रति सादर साभार समर्पित है।

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