जब खेलत-खेलत हम थक जाईं,
तब डांटि के पास बोलावेले माई।
दूरे से हमरा झूठे रोअले के,
अइसन नीक से पहचानेले माई।
तबो "हमार बचवा-बचिया" कहि के,
अंचरा में ले के दुलारेले माई।
रोटी के ओटी कहे, भात के बात,
दूध के दुधू कहे, दौड़े कटोरा ले के हाथ।
का जाने काहे, हमरा संगे तुतला के बोलेले,
कबहूं रोवेले त कबहूं हंस के हंसावेले।
टुकुर-टुकुर मुंहवे देखे, जब हम कतहीं जाईं,
सच पूछो त हमरो से बेसी रोवेले माई।
खैर, अब त हमहूँ कुछ काम धइलीं,
दुनिया की नजर में कुछ नाम कइलीं।
शांति से बाड़ी घरे अकेले ऊ अबहीं,
नौकर, चाकर, दाई सब आराम देले बाड़े तहीं।
तबो कबहूं ओकरा बइठल ना देखलीं भाई,
ना जाने काहे, आजहूँ छुप-छुप के रोवेले माई।
हम अब दुनिया के का समझाईं?
काम-धाम छोड़ के घरे कइसे बइठ जाईं?
हमार लइकन के अब के पढ़ाई?
महीना में बस एक बार ही त जा पाईं,
एक दिन फुर्सत से बैठ के बतियाईं।
ओकर देहल लकठ्ठो भर-भर के ले आईं,
तबो ना जाने काहे, आंसुअवे पोछेले माई।
अब त ना चीन्हेले, ना ककरो जानेले,
बचवा-बचिया त दूर, नमवो ना बखानेले।
डॉक्टर कहले बाड़न कि 'अल्ज़ाइमर' भइल बा,
सारा दुख-दरद ऊ अबहूँ अकेले सहत बिया।
छोट लइकन के देख के अभिनो तुरंत मुस्काई,
बाकिर अब 'माई' कहला पर ना बोलेले माई,
ना बोलेले, ना कछू समझेले माई।
- किरण कुमारी
भभुआ , बिहार
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भोजपुरी पद्य