बज्जिकांचल के धरा सोहावन,
ज्ञान-ध्यान के ई पहचान।
ई तप माटी ऋषि-मुनियन के,
आइयो गूंजे ओक्कर गान॥
गंडक,बागमती के धारा,
नियमित भरे फसल में प्रान।
भरे कोठारी-अंगना अन से,
तब मुसकाए धनिक किसान॥
वैशाली के गौरव गाथा,
लोकतंत्र के पहिल बिहान।
महावीर के जनम भूमि ई,
बनलन बुद्ध एही पथ आन॥
बज्जिका सन मीठगर बोली हई,
मइया के अँचरा के नेह।
गीत,भजन सोहर आ कजरी,
बसल लोक-जीवन हर देह॥
फूल सेज पर अतिथ पधारे,
ऊ पावे अजगुत सम्मान।
भेद भाव न तनिक इहां पर,
सबपर दृस्टि एक समान॥
मेहनत, ममता,मेल-जोल हए,
ई धरती के अप्पन बान।
एक्कर धमक निराला जग में,
सहिष्णुता हए एक्कर शान।
आऊ मिल संकल्प करु हम,
रक्खम भासा के सम्मान।
हम बज्जिका के मान बढ़ाएम,
जे हम्मर युग से पहचान॥
मणिभूषण प्रसाद सिंह " अकेला "
हाजीपुर, बिहार