हिंदी साहित्य के रीतिकाल में जहाँ अधिकांश कवि राजाओं के दरबार में केवल श्रृंगार और नायिका-भेद के वर्णन में व्यस्त थे, वहीं एक कवि ऐसा भी था जिसने प्रकृति के कण-कण को अपनी लेखनी का नायक बनाया। वे थे—महाकवि सेनापति (17वीं शताब्दी)। सेनापति ने प्रकृति के बदलते रंगों, ऋतुओं के आगमन और उनके मानवीय जीवन पर प्रभाव का जो सांगोपांग वर्णन किया है, वह पूरे मध्यकालीन साहित्य में बेजोड़ है।
सेनापति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने प्रकृति को केवल पृष्ठभूमि के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे एक सजीव पात्र के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी प्रसिद्ध कृति 'कवित्त रत्नाकर' में ऋतुओं का राजा 'बसंत' किसी सेनापति की तरह सज-धज कर आता दिखाई देता है।
पंक्तियाँ (बसंत ऋतु का आगमन):
बरन बरन तरु फूले उपबन बन, सोई चतुरंग संग दल लहियतु है।
बंदी जिमि बोलत बिरद बीर कोकिल हैं, गुंजत मधुप गान गुन गहीयतु है॥
भावार्थ: सेनापति कहते हैं कि वनों और उपवनों में रंग-बिंरगे फूल खिल गए हैं, मानो राजा बसंत की चतुरंगिनी सेना सजकर आ गई हो। कोयल रूपी बंदी जन राजा का यशगान कर रहे हैं और भौंरे उनके गुणों का गान करते हुए गुंजन कर रहे हैं।
सेनापति को 'श्लेष अलंकार' का सम्राट भी कहा जाता है। वे एक ही छंद में दो अलग-अलग अर्थ (जैसे एक अर्थ वर्षा ऋतु के लिए और दूसरा अर्थ ग्रीष्म ऋतु के लिए) इस चतुराई से पिरोते थे कि पाठक उनके शब्द-शिल्प को देखकर चकित रह जाता है। उनकी भाषा शुद्ध, साहित्यिक ब्रजभाषा है जिसमें गजब का प्रवाह और माधुर्य है।
प्रकृति-चित्रण के साथ-साथ सेनापति के काव्य में भगवान राम और कृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति भाव भी देखने को मिलता है। जीवन के उत्तरार्ध में वे वृंदावन चले गए थे और वहाँ उन्होंने वैराग्य तथा अध्यात्म से ओतप्रोत सुंदर पदों की रचना की।
महाकवि सेनापति का साहित्य हमें सिखाता है कि प्रकृति से दूर होकर मनुष्य का अस्तित्व अधूरा है। आज के कंक्रीट के जंगलों और ग्लोबल वार्मिंग के दौर में, जब हम प्रकृति से कट चुके हैं, सेनापति की कविताएँ हमें वापस मिट्टी, हवा और ऋतुओं के सौंदर्य से जुड़ने का संदेश देती हैं।
साभार और संदर्भ सूची :
स्रोत ग्रंथ: कवित्त रत्नाकर (मूल पाठ, संपादक: उमाशंकर शुक्ल)।
ऐतिहासिक संदर्भ: आचार्य रामचंद्र शुक्ल कृत 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (रीतिकाल)।
विशेष आभार: यह आलेख 'बोधायन पत्रिका' के मंच से प्रकृति के अनन्य उपासक महाकवि सेनापति के प्रति सादर साभार समर्पित है।