कौन हो तुम, खुद को पहचानो,
जीवन पथ में, हार न मानो।
गिरकर उठना, उठकर चलना,
साथी मेरे, बढ़ते रहना।
ध्येय तेरे सब पूरे होंगे,
मंज़िल से आगे है बढ़ना।
ओ मस्तानों, ओ दीवानों,
जीवन पथ में हार न मानो।
देखा सरहद पर जवान को,
देखा गाँवों में किसान को।
बहा के अपना, लहू-पसीना,
ज़िंदा रखा स्वाभिमान को।
साथी मेरे तुम प्रण ठानो,
जीवन पथ में हार न मानो।
देख नहीं पाँवों के छाले,
बढ़े चलो ऐ हिम्मत वाले।
मंज़िल से आगे बढ़ना है,
दुर्गम पथ में भी मतवाले।
मस्ती में बढ़ना मस्तानों,
जीवन पथ में हार न मानो।
नए सवेरे फिर आएँगे,
घोर निशा ये छँट जाएँगे।
जाएँगे ये पतझड़ के दिन,
फिर वासंती दिन आएँगे।
मेरे भारत की संतानों,
जीवन पथ में हार न मानो।
-उदय शंकर चौधरी 'नादान'
कोलहंटा पटोरी, दरभंगा