कितने रंग बदलते हो!
तुम दुनिया को छलते हो।
तुम सबसे ज्ञानी, सुलझे,
खुशफहमी में पलते हो।
खुद को पर्वत दिखलाते,
राई मगर निकलते हो।
ऊपर से शीतल दिखते,
अंदर-अंदर जलते हो।
बार-बार ठोकर लगती,
फिर भी नहीं सँभलते हो।
अपने मन की करने में,
कितने भाव कुचलते हो।
अर्जुन, सोच-समझ देखो,
किस साँचें में ढलते हो!
- अर्जुन प्रभात