वर्षों पुरानी बात है। एक नदी के शांत और सुरम्य तट पर, जहाँ ढलते सूरज की किरणें पानी पर सोने की तरह बिखरती थीं, सदियों से कुछ छोटे किसान और जनजातीय लोग रहते थे। उनके लिए वह ज़मीन सिर्फ़ मिट्टी नहीं, उनका पेट पालने वाली अन्नपूर्णा और पुरखों का आशीर्वाद थी।
उसी राज्य का राजा बेहद महत्वाकांक्षी था। उसके पास बुद्धि तो कम थी, लेकिन अमर होने की चाहत बहुत बड़ी थी। वह इतिहास में अपना नाम चाहता था। वह चाहता था कि अपने जीवनकाल में कुछ ऐसा भव्य बनाए कि युगों-युगों तक लोग उसे याद रखें। एक रात उसने बेचैनी में अपने मंत्री से कहा, "मैं इतिहास के पन्नों में धूल बनकर खोना नहीं चाहता। मुझे उस नदी के तट पर एक ऐसा शीशमहल चाहिए, जिसकी दीवारों में पूरा आसमान झलके और आने वाली सदियाँ मेरी भव्यता के आगे सिर झुकाएँ!"
जब राजा के सैनिक उस शांत बस्ती में पहुँचे, तो उन्होंने धन की थैलियाँ खोल दीं। अभाव में जी रहे कई छोटे किसानों ने डर और लालच के वश में आकर अपनी ज़मीनें राजा के नाम कर दीं। राजा के लोग लगभग सबसे ज़मीन लेने में कामयाब रहे। लेकिन उस बस्ती के छोर पर, सबसे उपजाऊ ज़मीन के टुकड़े पर एक किसान रहता था जो अडिग था। वह अपनी ज़मीन को मामूली मिट्टी नहीं, बल्कि अपनी माँ और साक्षात भगवान का आशीर्वाद समझता था। जब सैनिकों ने उससे ज़मीन माँगी, तो उसने मिट्टी को मुट्ठी में भींचा और कहा, "ज़मीन बेची जा सकती है, हुज़ूर... पर माँ का सौदा नहीं होता। यह हमारे पुरखों की निशानी है।"
जब सीधे तरीके से बात नहीं बनी, तो राजा ने उस अकेले किसान पर 'साम, दाम, दंड, भेद' के सारे नियम आजमाए। सबसे पहले राजा ने अपने सबसे मीठा बोलने वाले दूत को भेजा। दूत ने कहा, "अरे भाई! तुम तो बड़े भाग्यशाली हो। साक्षात महाराज तुम्हारी ज़मीन पर अपना सपनों का महल बनाना चाहते हैं। इतिहास में तुम्हारा नाम लिखा जाएगा।" किसान ने हाथ जोड़कर कहा, "हुज़ूर, इतिहास में नाम बड़े लोगों का होता है, हम गरीबों का नहीं। और अपनी माँ को उजाड़कर कैसा इतिहास? मेरी ना ही समझिए।"
फिर दूसरी नीति अपनाई गई; खुद मंत्री सोने के सिक्कों से भरा एक बड़ा थाल लेकर किसान की झोपड़ी में पहुँचा। मंत्री ने मुस्कुराते हुए कहा, "इस ज़मीन की जो कीमत है, महाराज उसका सौ गुना दे रहे हैं। इतनी दौलत कि तुम्हारी आने वाली सात पीढ़ियाँ बैठकर खाएँगी।" किसान ने उन चमकते सिक्कों को देखा तक नहीं। उसने ज़मीन से एक मुट्ठी मिट्टी उठाई और मंत्री के हाथ पर रख दी, "मंत्री जी, इस मिट्टी से जो अनाज उगता है, उससे मेरा पेट भरता है। आपकी इस सोने की चमक से भूख नहीं मिटती। माँ की ममता की कोई कीमत नहीं लगा सकता।"
इस हार से राजा और उसके मंत्रियों को बहुत क्रोध आया। उन्होंने इस बार किसान को डरा-धमकाकर बस में करने का निर्णय लिया। राजा के कारिंदों ने किसान के खेत में खड़ी फसल को हाथियों से कुचलवा दिया, उसकी झोपड़ी को आग लगा दी और कुएँ में कचरा डाल दिया ताकि वह भूखा-प्यासा मर जाए। लेकिन किसान डिगा नहीं। वह भूखा रहा, खुले आसमान के नीचे सोया, अपनी उजड़ी हुई फसल को देखकर रोया, लेकिन अपनी ज़मीन को नहीं छोड़ा। राजा जितनी ताकत आजमाता, किसान का ज़मीन से उतना ही प्रेम बढ़ता जाता। वह रोज़ सुबह उठकर उस राख हो चुकी मिट्टी को चूमता और कहता, "माँ, मैं तुझे छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।"
अंत में क्रोधित राजा ने अति कठोरता का आदेश दिया। आदेश पाते ही मंत्री ने गाँव के बाकी लोगों को इकट्ठा किया और कहा, "देखो, इस एक सनकी किसान की वजह से महाराज का काम रुका हुआ है। अगर महल नहीं बना, तो महाराज तुम लोगों से भी नाराज़ हो जाएँगे और जो पैसा तुम्हें मिला है, वह भी छीन लिया जाएगा।" दबाव और डर में आकर गाँव के ही लोग अपने उस पड़ोसी किसान के खिलाफ हो गए, उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया। अपनों का यह बर्ताव किसान के दिल को चीर गया, वह अंदर से अकेला पड़ गया, पर उसकी आस्था अपनी ज़मीन पर वैसी ही बनी रही।
समय बीतता गया और राजा बहुत अधिक बूढ़ा हो गया। अब वह ज्यादा चल-फिर नहीं पाता था। उसे लगने लगा कि उसके पास ज़्यादा वक़्त नहीं है। शीशमहल बनाने की उसकी इच्छा और तीव्र हो गई। राजा बिस्तर से लग गया और उसे लगा कि उसकी अंतिम इच्छा अधूरी ही रह जाएगी। उसने अपने मंत्रियों को बुलाकर अपनी बेबसी जताई, "मेरा अंत निकट है... लेकिन मेरा सपना अधूरा है। मैं एक मामूली किसान से हार गया। अब मैं यह घोषणा करता हूँ कि जो भी मंत्री मेरे सपने को पूरा करने में सफल होगा, मैं उसे मुँह माँगा इनाम दूँगा।"
इतना सुनते ही एक कुटिल और धूर्त मंत्री राजा के सामने आया। उसने अपनी चतुराई की डींग हाँकते हुए कहा, "महाराज, आप धीरज रखिए। जहाँ तलवार की धार और सोने की चमक काम नहीं आती, वहाँ इंसानी कमजोरी से काम लेना पड़ता है। अगर आपकी आज्ञा हो, तो मेरे पास एक ऐसा उपाय है जिससे वह किसान खुद रोते हुए अपनी ज़मीन आपके चरणों में रख देगा।"
राजा की आज्ञा मिलते ही मंत्री ने अपनी योजना पर कार्य करना शुरू कर दिया। उसने रात के अंधेरे में अपने वफादार सैनिकों को भेजा और किसान की ज़मीन के ठीक बगल वाले हिस्से में राजघराने के तहखाने से निकाली गई एक अत्यंत प्राचीन देवी की मूर्ति को मिट्टी में गाड़ दिया और ऊपर से घास बिखेर दी। कुछ दिनों बाद, मंत्री के ही भेजे मजदूरों ने वहाँ खुदाई का नाटक किया। अचानक एक मजदूर की कुदाल पत्थर से टकराई और वह चिल्लाया, "ठहरो! यहाँ कुछ है!" जब मिट्टी हटाई गई, तो वह प्राचीन मूर्ति बाहर निकली। चारों तरफ हल्ला हो गया कि यहाँ साक्षात देवी माँ प्रकट हुई हैं। वहाँ भक्तों की भीड़ जुटने लगी और मंत्री ने एक भव्य मंदिर का ढांचा खड़ा करवाकर शहर से एक बड़े पंडित जी को वहाँ बिठा दिया।
वह किसान स्वभाव से बहुत भावुक और परम धार्मिक व्यक्ति था। प्रकट हुई देवी की मूर्ति को देखकर उसका हृदय भी भक्ति से भर गया। वह बड़ी श्रद्धा से अपने ग्रामीणों के साथ रोज मूर्ति के दर्शन करने जाने लगा। योजना के अनुसार पंडित जी ने एक दिन किसान को पास बुलाकर कहा, "भक्तराज! देवी माँ ने मुझे स्वप्न में दर्शन दिए हैं। माता चाहती हैं कि इस मंदिर के परिसर का विस्तार हो, यहाँ एक विशाल चबूतरा बने और दूर-दूर से आने वाले भक्तों के लिए धर्मशाला बने। इसके लिए माता ने तुम्हारी भूमि चुनी है। क्या तुम देवी की इच्छा पूरी करोगे?"
यह सुनकर वह भावुक किसान पूरी तरह टूट गया। उसे अपनी ज़मीन से बिछड़ने का बहुत गहरा दुख हुआ, लेकिन इस भ्रम में कि यहाँ मंदिर का पवित्र कार्य होगा और साक्षात जगदम्बा उसकी भूमि पर विराजेंगी, उसने रोते हुए अपनी ज़मीन दान कर दी।
लेकिन ज़मीन हाथ में आते ही राजा का असली खेल शुरू हुआ। वहाँ मंदिर के विस्तार की जगह आलीशान शीशमहल का निर्माण कार्य शुरू हो गया। हज़ारों की तादाद में चमकीले शीशे और नक्काशीदार खंभे उतरने लगे। यहाँ तक कि उस मंदिर के गुंबद को भी तोड़ दिया गया और उसे शीशमहल के अंदर ही एक छोटे से कोने में समेट दिया गया। जब उस सीधे-साधे किसान ने यह देखा, तो उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। वह चीख पड़ा, "नहीं! यह देवी का स्थान नहीं... यह तो उस पापी राजा का महल है! मेरे साथ धोखा हुआ है! राजा, मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगा।" वह इस सदमे और शोक को बर्दाश्त नहीं कर पाया कि उसकी माँ जैसी ज़मीन छल से छीन ली गई है। इसी गहरे दुख में एक रात नदी के तट पर अपनी उजड़ी मिट्टी पर गिरकर उसने दम तोड़ दिया। धोखा खाने का गम उसकी मौत का कारण बन गया।
उधर, जैसे ही शीशमहल का ढांचा खड़ा होना शुरू हुआ और राजा को पता चला कि वह बूढ़ा किसान रोते-रोते मर गया है, वैसे ही राजा की बची-खुची ज़िंदगी भी नर्क बन गई। बूढ़ा राजा दिनभर बिस्तर पर लेटा रहता। जैसे ही रात का सन्नाटा गहराता, उसको सांस लेने में तकलीफ होने लगती। उसे लगता कि कमरे की हवा भारी हो गई है और अंधेरे में से निकलकर वही बूढ़ा किसान, जिसकी आँखों में छले जाने का गहरा दुख और आक्रोश था, राजा के बिस्तर के पास आता था। राजा चाहकर भी हिल नहीं पाता था, चीख नहीं पाता था। वह साया सीधे राजा के सीने पर आकर बैठ जाता और उसके धुंधले, मिट्टी से सने हाथ राजा का गला घोंटने लगते। वह साया रोज़ रात राजा के कानों में फुसफुसाता, "तूने छल से मेरी ज़मीन ली है राजा... तू इस ज़मीन पर कभी चैन से नहीं रह पाएगा! जैसे मैं तड़प-तड़प के घुट-घुट के मरा, तू भी मरेगा।"
राजा की रातों की नींद पूरी तरह गायब हो चुकी थी। देश-विदेश के सारे हकीम, वैद्य और जड़ी-बूटियों के अर्क बेकार हो गए। राजा को डर के मारे नींद ही नहीं आती थी, जिसके कारण वह कंकाल जैसा दिखने लगा था और उसकी बची-खुची ज़िंदगी भी रेत की तरह हाथों से फिसल रही थी। जब सारे इलाज नाकाम हो गए, तो पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया गया: "सुनो, सुनो, सुनो! महाराज एक अज्ञात और भयानक प्रेत-बाधा से पीड़ित हैं। जो कोई भी महाराज को इस कष्ट से मुक्त कराएगा और उन्हें चैन की नींद दिलाएगा, उसे इनाम में आधा राज्य दे दिया जाएगा!" देश-विदेश से तांत्रिक और ओझा आए, लेकिन राजा की रातों का खौफ कम नहीं हुआ। वह हर पल तड़पता और सोचता कि कैसे मुझे नींद आए, कैसे मुझे एक पल का चैन मिले।
तभी एक दिन, राजदरबार में एक शांत, तेजस्वी और साधारण से दिखने वाले साधु का आगमन हुआ। उसने राजा की नाड़ी देखी, उसकी धँस चुकी आँखों में झाँका और सीधे राजा के कान में कहा, "राजन! तुम्हारी समस्या का कारण तुम स्वयं हो। अपनी अँधी महत्वाकांक्षा के कारण तुमने पाप किया है। वह किसान, जिसकी ज़मीन तुमने धोखे से हड़प ली, उसकी आत्मा न्याय मांग रही है और वह तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ने वाली।"
राजा थर-थर कांपने लगा। उसने साधु के पैर पकड़ लिए और रोते हुए कहा, "ऋषिवर, मुझे बचाइए! मैं इस तड़प से मर रहा हूँ। मुझे बताइए मैं क्या करूँ कि मुझे इस भयानक स्वप्न से मुक्ति मिले? मैं सब कुछ छोड़ने को तैयार हूँ।"
साधु ने गंभीर आवाज़ में कहा, "राजन! किसान और राजा दोनों एक समान होते हैं। किसान को अपनी ज़मीन का और राजा को अपनी प्रजा का ख़्याल रखना चाहिए, यही धर्म है। तुमने सिर्फ़ एक किसान के साथ नहीं, अपनी पुत्र समान प्रजा के साथ छल किया है। अगर सुखी जीना चाहते हो, तो उस अधूरे शीशमहल के गगनचुम्बी ढाँचे को तुरंत गिरा दो। वहाँ उस शीशमहल के बदले साक्षात देवी माँ का एक ऐसा भव्य मंदिर बनाओ, जिसका वादा तुमने उस भोले किसान से किया था। और सुनो, उस मंदिर के मुख्य द्वार पर उस किसान का नाम स्वर्ण अक्षरों में खुदवाओ, ताकि आने वाली सदियाँ जानें कि इस पवित्र स्थान के लिए उसने अपनी जान दी थी। साथ ही, जहाँ उस बूढ़े ने दम तोड़ा था, वहाँ उसकी आत्मा की शांति के लिए राहगीरों के लिए एक बड़ी धर्मशाला और शीतल जल का प्याऊ बनवाओ। जब तक तुम यह प्रायश्चित नहीं करोगे, तब तक यह दुःस्वप्न तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगा।"
मौत के डर से कांपते और तड़पते राजा ने तुरंत आदेश जारी कर दिया। आलीशान शीशमहल बनने से पहले ही रोक दिया गया, उसकी गगनचुंबी दीवारें ढहा दी गईं। हज़ारों कारीगर अब एक भव्य और अलौकिक मंदिर के निर्माण में जुट गए। ठीक उसी जगह जहाँ किसान ने रोते हुए दम तोड़ा था, एक सुंदर, हवादार धर्मशाला और शीतल जल का प्याऊ बनाया गया। मंदिर के मुख्य द्वार के पत्थर पर बड़े-बड़े स्वर्ण अक्षरों में खुदा था: "किसान का मंदिर - जिसकी पवित्र आहुति से यह देव-स्थान निर्मित हुआ।"
जैसे ही मंदिर पूरी तरह बनकर तैयार हुआ, पहली आरती की घंटी गूँजी और प्याऊ से राहगीरों ने पानी पीना शुरू किया, राजधानी के महल में लेटे राजा को लगा कि उसके सीने से एक बहुत भारी पत्थर अचानक हट गया है। हवा हल्की हो गई और उसका दम घुटना बंद हो गया।
उसे सालों बाद एक गहरी और सुकून भरी नींद आने लगी। उस रात, राजा ने जब अपनी आँखें मूंदीं, तो उसे सपने में वह बूढ़ा किसान दोबारा दिखाई दिया। लेकिन इस बार उसकी आँखों में गुस्सा या आक्रोश नहीं था। उसके चेहरे पर एक शांत, दैवीय मुस्कान थी, जैसे वह कह रहा हो कि अब उसकी आत्मा को शांति मिल गई है और उसकी ज़मीन सही मायने में पवित्र काम में आ गई है। राजा को अपने भयानक स्वप्न और पाप से हमेशा के लिए मुक्ति मिल चुकी थी। महत्वाकांक्षा का वह घमंडी महल तो नहीं बना, लेकिन न्याय और प्रायश्चित का वह मंदिर "किसान का मंदिर" के नाम से हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया।
- डॉ प्रीति सुमन
सीतामढ़ी, बिहार
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