गरिमा सक्सेना हिंदी की कई विधाओं में एक साथ अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कर रही हैं। दोहा, नवगीत, गीत और ग़ज़ल के बाद उन्होंने आलोचना में भी बहुत जल्द अपने आप को स्थापित कर लिया है।
"रौशनी के पक्ष में" गरिमा सक्सेना का नया ग़ज़ल संग्रह है, जिसमें कई मिज़ाज की ग़ज़लें शामिल हैं।
असल में दोहा और गीत के बाद वह ग़ज़ल में आई हैं। दोहा अपने छंद विधान और गीत अपनी काल्पनिक उड़ान के लिए जाना जाता है। यह दो ख़याल जहाँ मिल जाते हैं, वहाँ ग़ज़ल की ज़मीन तैयार होती है। गरिमा सक्सेना की ग़ज़लों की ज़रख़ेज़ ज़मीन में उगती हुई वह फ़सलें हैं, जो आसमान को छूने का माद्दा रखती हैं।
उनकी शायरी हमें उबाती नहीं है, फ़िक्र पैदा करती है। उनके अशआर में कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखती। वह 'भरपाई' के शेर नहीं कहतीं, और न किसी के ख़यालों को समेट लेती हैं। उनके पास अपनी महसूस की हुई दुनिया है, अपना तर्ज़ और शिल्प विधान है। उर्दू और हिंदी ग़ज़ल में कथ्य के स्तर पर एक सबसे बड़ा अंतर यह है कि उर्दू ग़ज़ल जहाँ मोहब्बत को लेकर पैदा होती है, वहीं हिंदी ग़ज़ल शिकायत को लेकर हमारे सामने आती है। दुष्यंत और अदम की शायरी इसी नाराज़गी पर आधारित है। यह नाराज़गी सत्ता से भी है, व्यवस्था से भी, और कई बार अपने आप से भी। उनकी ग़ज़ल का पहला ही शेर इस परत को खोल कर रख देता है:
कभी रंगीन परदों से कभी दिलकश नज़ारों से,
हमेशा सच छुपाया जा रहा है इश्तिहारों से।
उनके पास देखने वाली दृष्टि है, और मुख़ालफ़त करने वाली हिम्मत। वह अन्य स्त्री रचनाकारों की तरह किसी 'विमर्श' का हिस्सा नहीं बनतीं, बल्कि हक़ीक़त बयान करती हैं:
सभी तो चुप हैं यहाँ हुक्मरान के आगे,
बढ़ेगी बात नहीं फिर बयान के आगे।
यह वह शेर है जो मौजूदा सियासत के चरित्र को खोलकर रख देता है। उनकी ग़ज़लों में ज़बरदस्त तंज़ है। हिंदी ग़ज़ल की परंपरा में इस प्रकार व्यवस्था पर तंज़ करने वाला दूसरा स्त्री ग़ज़लकार नहीं हुआ। वह ग़ज़ल में एक स्त्री होने का रोना नहीं रोतीं, वह इस बुरे दौर में प्रेम पर शायरी करती हुई अपना वक़्त और शब्द बर्बाद नहीं करतीं, बल्कि इन पुरुषों की दुनिया में एक 'मर्द' बनकर अपनी बात कहती हैं। उनकी ग़ज़लों में विद्रोह होने के बावजूद भाषा का लालित्य नहीं जाता; वह विष को ज़ब्त कर अमृत उगलने वाली शायरा हैं। गरिमा कई बार महज़ एक सवाल कर रुक जाती हैं:
जाल ख़ुद ही बनाया था क़ैद ख़ुद उसमें हुए,
फिर बताओ अब तुम्हें क्यों बेबसी होने लगी।
उनकी शिकायत सिर्फ़ व्यवस्था से नहीं है, बल्कि उन लोगों से भी है जिन्होंने संघर्ष को छोड़कर काहिली को अपना लिबास बना लिया है:
कैसे मंज़िल की तमन्ना वो करेंगे पूरी,
दो क़दम चल के जो शुरुआत बदल देते हैं।
ऐसा नहीं है कि उनकी शायरी में स्त्री है ही नहीं; स्त्री है, लेकिन यह बहुत मज़बूत स्त्री है। वह किसी से कोई याचना नहीं करती, और न ज़िंदगी के किसी शोबे में कमज़ोर बनती है:
बच्चों को देखती है, दफ्तर को देखती है,
दफ्तर से लौट कर वह फिर घर को देखती है।
वास्तव में यह स्त्री की दोहरी ज़िंदगी का यथार्थ है। उनकी नज़र पुरुष के दोहरे चरित्र पर भी है, जिसने हर युग में एक नया लिबादा पहन रखा है:
लगने लगा है वो मुझे शैतान की तरह,
जो दिख रहा था हर घड़ी भगवान की तरह।
कभी दुष्यंत ने कहा था— "मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।" गरिमा सक्सेना भी इस चीज़ की पड़ताल करती हैं:
बस दिखा कर ख़्वाब बासी ताज़गी की शक्ल में
योजनाएँ चल रही हैं धांधली की शक्ल में।
उनकी ग़ज़ल कई बार बहुत ख़ास बात को भी आम तरीके से कह देती है:
पीपल को काटा तो पाप लगेगा कुछ,
उसको पीपल औरों से कटवाना है।
यही ग़ज़ल का लहज़ा है, और ग़ज़ल को इसी गुफ़्तगू का अंदाज़ पसंद है। उनकी इस किताब में सत्तर से अधिक ग़ज़लें हैं, और अंत में अलग-अलग रसों और विषयों के कई शेर हैं।
इस पुस्तक को पढ़ते हुए उनका मौलिक कथ्य, भाषा की सादगी, लहज़ा और मुहावरा, तथा बनावट और बुनावट पाठकों को कभी निराश नहीं करेगी। अपनी खूबसूरत छपाई से भी यह कृति आकर्षण का केंद्र बन गई है।
- ज़ियाउर रहमान जाफ़री
नालंदा, बिहार
पुस्तक - रौशनी के पक्ष में
विधा: ग़ज़ल, वर्ष: 2025,
श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा
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