किश्ती को जो डूबने से बचा सके, ऐसी पतवार चाहिए,
जड़ें काट दे बुराई की, अच्छाई में ऐसी धार चाहिए।
नफ़रत की तेज़ आँधियों ने उजाड़ डाला यह खिलता चमन,
बहती रहे जो प्यार की हृदय में, ऐसी बयार चाहिए।
करे जो छुप कर पीठ पर, न ऐसा वार चाहिए,
छक्के छुड़ा दे जो दुश्मन के, सुनकर ऐसी ललकार चाहिए।
लोग लेते हैं पैसा, भाग जाते हैं दूर विदेश आजकल,
लेकर लौटा न सके जिसे कोई, न ऐसा उधार चाहिए।
बढ़ा दे जो बीच में दूरियाँ, न ऐसी तकरार चाहिए,
माफ़ कर दे छोटी-मोटी बातों को, ऐसा दिलदार चाहिए।
बेईमानी की आदत पड़ गई है सबको आज ज़माने में,
करे जो काम ईमानदारी का, ऐसा कोई तो हक़दार चाहिए।
शब्द भी करते हैं घायल, न उसके लिए तलवार चाहिए,
प्यार के फूल खिलें हर तरफ़, ऐसी बहार चाहिए।
नफ़रत करने वालों से तो भरा है यह सारा जहान,
प्यार की क़द्र करे जो, ऐसा कोई तलबगार चाहिए।
ईमानदारी से ही जो फले-फूले, ऐसा कोई कारोबार चाहिए,
पेट भर के खाना मिल जाए, बस ऐसा रोज़गार चाहिए।
सिद्धांतों की बात यहाँ कौन करता है इस ज़माने में,
डगमगाने न दे जो अपने पथ से, ऐसे संस्कार चाहिए।
— रवींद्र कुमार शर्मा
(नज़दीक डी० ए० वी० स्कूल, गाँव व डाकघर: घुमारवीं, ज़िला: बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश - 174021)