डगमगाने न दे जो ऐसे संस्कार चाहिए (कविता) - रवींद्र कुमार शर्मा



​किश्ती को जो डूबने से बचा सके, ऐसी पतवार चाहिए,

जड़ें काट दे बुराई की, अच्छाई में ऐसी धार चाहिए।

​नफ़रत की तेज़ आँधियों ने उजाड़ डाला यह खिलता चमन,

बहती रहे जो प्यार की हृदय में, ऐसी बयार चाहिए।


​करे जो छुप कर पीठ पर, न ऐसा वार चाहिए,

छक्के छुड़ा दे जो दुश्मन के, सुनकर ऐसी ललकार चाहिए।

​लोग लेते हैं पैसा, भाग जाते हैं दूर विदेश आजकल,

लेकर लौटा न सके जिसे कोई, न ऐसा उधार चाहिए।


​बढ़ा दे जो बीच में दूरियाँ, न ऐसी तकरार चाहिए,

माफ़ कर दे छोटी-मोटी बातों को, ऐसा दिलदार चाहिए।

​बेईमानी की आदत पड़ गई है सबको आज ज़माने में,

करे जो काम ईमानदारी का, ऐसा कोई तो हक़दार चाहिए।


​शब्द भी करते हैं घायल, न उसके लिए तलवार चाहिए,

प्यार के फूल खिलें हर तरफ़, ऐसी बहार चाहिए।

​नफ़रत करने वालों से तो भरा है यह सारा जहान,

प्यार की क़द्र करे जो, ऐसा कोई तलबगार चाहिए।


​ईमानदारी से ही जो फले-फूले, ऐसा कोई कारोबार चाहिए,

पेट भर के खाना मिल जाए, बस ऐसा रोज़गार चाहिए।

​सिद्धांतों की बात यहाँ कौन करता है इस ज़माने में,

डगमगाने न दे जो अपने पथ से, ऐसे संस्कार चाहिए।


​— रवींद्र कुमार शर्मा

(नज़दीक डी० ए० वी० स्कूल, गाँव व डाकघर: घुमारवीं, ज़िला: बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश - 174021)



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