छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक महादेवी वर्मा जी का साहित्य इतना अगाध है कि उसे संक्षिप्त में समेटना कठिन है।
हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद के चतुर्थ स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित महादेवी वर्मा (1907–1987) केवल एक अद्वितीय कवयित्री ही नहीं, बल्कि भारतीय चेतना की वह अमर साधिका हैं जिन्होंने वेदना, करुणा और स्त्री-अस्मिता को दार्शनिक ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। साहित्य जगत् उन्हें आदर से 'आधुनिक युग की मीरा' कहता है।
महादेवी जी की कविताओं का मूल स्वर 'करुणा' और 'अलौकिक विरह' है। उनका रहस्यवाद लौकिक वासना से परे एक असीम, निराकार प्रियतम के प्रति समर्पित है।
जहाँ अन्य कवियों के लिए विरह दुःखांत होता है, वहीं महादेवी जी के लिए विरह आत्मा को माँजने और परिष्कृत करने का माध्यम है। उनकी पंक्तियों में उदात्त समर्पण की गूँज मिलती है:
"मिलन का मत नाम ले, मैं विरह में नित लीन हूँ!
प्रियतम तुम घन, मैं चातक री!
तुम सागर, मैं लहर अनूप!"
उनकी प्रमुख काव्य-कृतियों—'नीहार', 'रश्मि', 'नीरजा', 'सांध्यगीत' और 'दीपशिखा'—में काव्यशास्त्र और संगीत का अद्भुत संगम है। उनकी कालजयी कृति 'यामा' के लिए उन्हें साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982) से अलंकृत किया गया।
प्रायः लोग महादेवी जी को केवल एक भावुक कवयित्री मानते हैं, किंतु गद्य के धरातल पर उनकी वैचारिक प्रखरता और बौद्धिक क्षमता अद्वितीय थी:
'श्रृंखला की कड़ियाँ' (1942): यह पुस्तक हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श की पहली शास्त्रीय और वैचारिक बुनियाद मानी जाती है। इसमें उन्होंने भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक संरचना, स्त्री के आर्थिक परावलंबन और उसकी सामाजिक मुक्ति पर अत्यंत निर्भीक तथा तर्कसंगत विचार रखे।
रेखाचित्र और संस्मरण: 'अतीत के चलचित्र', 'स्मृति की रेखाएँ', और 'पथ के साथी' के माध्यम से उन्होंने समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े उपेक्षित पात्रों (जैसे- भक्तिन, घिसा, रामा, सबिया) का ऐसा सजीव चित्र खींचा, जो पाठक के मन में करुणा और सामाजिक न्याय की चेतना जगाता है।
"मैं नीर भरी दुख की बदली!
स्पंदन में चिर स्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झरिणी मचली!
पथ को न मलिन करता आया,
पद-चिह्न न दे जाता जाता;
उमड़ी कल थी मिट आज चली!"
महादेवी वर्मा जी का मानना था कि कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि वह आत्मा के परिष्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व का माध्यम है। अपने निबंध संग्रह 'साहित्यकार की आस्था' में वे लिखती हैं कि एक सच्चे कलाकार की संवेदनशीलता संपूर्ण प्राणिमात्र के दुखों से जुड़नी चाहिए।
उन्होंने प्रयाग में 'साहित्यकार संसद' की स्थापना कर नए रचनाकारों को एक मंच दिया और आजीवन हिंदी भाषा के मानकीकरण व संवर्द्धन के लिए कार्य किया।
महादेवी वर्मा जी का संपूर्ण जीवन और साहित्य हमें यह सिखाता है कि 'करुणा कोई दुर्बलता नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी नैतिक ताक़त है।' आज के बाज़ारीकरण और एकाकीपन के युग में, जब मनुष्य आत्मीयता खो रहा है, तब महादेवी जी की कविताएँ मन में संवेदना की लौ जलाए रखती हैं।
- बोधायन पत्रिका