आज 31 जुलाई मुंशी प्रेमचंद जी की 146वीं जयंती है।
लमही के जिस दीये ने 1880 में जन्म लिया, उसकी रोशनी आज भी भारतीय समाज के अँधेरे कोनों को उजागर कर रही है। आज 31 जुलाई है। भारतीय साहित्य के क्षितिज पर चमकते 'उपन्यास सम्राट' मुंशी प्रेमचंद जी की जयंती। यह केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि उस चेतना को याद करने का दिन है जिसने भारतीय साहित्य को आम आदमी के दुखों, संघर्षों और आशाओं से जोड़ा। लगभग एक सदी पहले लिखा गया उनका साहित्य आज भी उतना ही ताज़ा, जीवंत और ज़रूरी लगता है। यह सदी उन्हें न केवल याद रखेगी, बल्कि अपने दौर की समस्याओं को समझने के लिए बार-बार उनकी कलम की शरण में जाएगी।
प्रेमचंद से पूर्व हिंदी साहित्य प्रायः राजा-रानियों, तिलिस्म और जादुई दुनिया में खोया हुआ था। प्रेमचंद ने उसे उस काल्पनिक दुनिया से निकालकर गाँवों की पगडंडियों, किसानों के फटेहाल जीवन और मज़दूरों के पसीने की गंध से जोड़ा। उन्होंने साहित्य को 'यथार्थवाद' की ठोस ज़मीन प्रदान की।
उनके लिए साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि वह सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम था। उनकी रचनाओं में हम उस भारत को देखते हैं जो महलों में नहीं, बल्कि झोपड़ियों में बसता है, जहाँ ग़रीबी, अशिक्षा और अंधविश्वास का बोलबाला है।
जब हम आज के अखबार पढ़ते हैं या न्यूज़ चैनल देखते हैं, तो हमें लगता है कि प्रेमचंद के पात्र आज भी हमारे आसपास जी रहे हैं।
आज भी भारतीय किसान क़र्ज़ के बोझ तले दबा है, उसकी फसल का सही मूल्य नहीं मिलता, और वह मौसम की मार झेल रहा है। प्रेमचंद का कालजयी उपन्यास 'गोदान' केवल होरी की कहानी नहीं है, बल्कि वह आज भी क़र्ज़ की फाँसी पर लटकते भारतीय किसान का जीवंत दस्तावेज है।
समाज डिजिटल हो गया है, लेकिन जातिवाद की जड़ें आज भी गहरी हैं। 'सदगति' की करुणा और 'ठाकुर का कुआँ' की प्यास आज भी दलित समाज के संघर्ष को बयां करती है। प्रेमचंद ने उस समय इन विषयों पर लिखा जब उन पर बात करना भी वर्जित था। उनकी कहानियाँ आज भी सामाजिक समता की वकालत करती हैं।
आज स्त्रियाँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन दहेज प्रथा, बेमेल विवाह और स्त्री की आर्थिक पराधीनता आज भी मुद्दे हैं। 'निर्मला' उपन्यास उस कोमल उम्र की लड़की का त्याग और पीड़ा है जो सामाजिक कुरीतियों की वेदी पर चढ़ा दी जाती है। प्रेमचंद का साहित्य स्त्री को एक इंसान के रूप में पहचान दिलाने का प्रयास है।
एक तरफ़ जहाँ उनके उपन्यास गोदान, ग़बन, रंगभूमि, निर्मला, सेवा सदन जैसे उपन्यासों में उन्होंने राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना की ऐसी गहरी पड़ताल की जो आज भी समाजशास्त्रियों के लिए अध्ययन का विषय है।
वहीं दूसरी तरफ़ उनकी कहानियाँ कफ़न, पूस की रात, ईदगाह, पंच परमेश्वर, नमक का दारोग़ा— उनकी कहानियाँ गागर में सागर हैं। 'कफ़न' में वे ग़रीबी के उस चरम रूप को दिखाते हैं जहाँ मनुष्य की संवेदनशीलता मर जाती है, जबकि 'ईदगाह' में 'हामिद' का चिमटा एक बच्चे की परिपक्वता और त्याग का प्रतीक बन जाता है।
हालाँकि वे मूलतः कथाकार थे, किंतु उन्होंने कर्बला, संग्राम और प्रेम की वेदी जैसे नाटक लिखकर सामाजिक समरसता और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संदेश दिया।
उन्होंने साहित्य में उन लोगों को नायक बनाया जिनकी आवाज़ कभी नहीं सुनी जाती थी। उनका साहित्य भारतीय समाज की आत्मा का आईना है—अपनी तमाम ख़ूबियों और ख़ामियों के साथ। वे हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। उनकी कलम कभी भी कठोर नहीं हुई, उसमें हमेशा एक गहरी करुणा और मानवीय संवेदनशीलता छिपी रही, जो पाठक के मन को झकझोर देती है। उन्होंने ऐसी भाषा में लिखा जो सीधे आम जनता के दिल तक पहुँचती थी। उन्होंने हिंदी और उर्दू के बीच एक पुल बनाया।
मुंशी प्रेमचंद केवल अतीत का हिस्सा नहीं हैं, वे हमारे वर्तमान का एक हिस्सा हैं और हमारे भविष्य के लिए एक मार्गदर्शक भी। जब तक समाज में असमानता, अन्याय और शोषक-शोषित का संबंध बना रहेगा, प्रेमचंद के साहित्य की रोशनी हमें अँधेरे से लड़ने का संबल देती रहेगी।
उनकी जयंती पर उन्हें शत-शत नमन!
- बोधायन पत्रिका
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कालजयी रचनाकार