इस इश्क़ की दुकाँ के तलबगार तुम भी हो (ग़ज़ल) - अविनाश बन्धु


इस इश्क़ की दुकाँ के तलबगार तुम भी हो,
हम ही नहीं हैं सिर्फ़ ख़रीदार तुम भी हो।

बैठे हुए हैं हम भी तो साहिल पे प्यार के,
कश्ती पे इधर आने को तैयार तुम भी हो।

तोड़ी हर एक रस्म कि बस तुमको देख लें,
हमने ख़ता जो की तो गुनहगार तुम भी हो।

मेरी ज़रा-सी बात तुम्हें इतनी चुभ गई,
रक्खे हुए ज़ुबाँ पे तो तलवार तुम भी हो।

बातों में 'बन्धु' की है अजब शक्ति सी कोई,
वो दिल में है तुम्हारे तो दमदार तुम भी हो।

- अविनाश बन्धु 
कवि, गायक, अभिनेता, 
पटना, बिहार 


प्रकाशित पुस्तक - अपने हिस्से का ख़्वाब 
संपादक - दिव्य आलेख ( पत्रिका)

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