मौन निमंत्रण है राघव,
प्रण कठिन पिता ने है ठाना,
हे राम स्वयंवर में आना।
देख मनोहर छवि राम की,
हुई मुदित मनमुग्ध जानकी।
सिया-राम की अनुपम जोरी,
रघुवर भानु, चंद्र-किशोरी।
कैसा सम्मोहन है राघव,
न मैं जानू, न तुमने जाना,
हे राम स्वयंवर में आना।
रुनझुन-रुनझुन, झनन-झनन झन,
छन-छन छन-छन छमकत छन-छन।
बावरी सखि पग करती नर्तन,
पायल के स्वर में खोया मन।
विस्मृत यह देख हुए राघव,
मुश्किल इस क्षण से बच पाना,
हे राम स्वयंवर में आना।
प्रीत की वर्तिका उर में जलने लगी,
सुमन वाटिका भी मचलने लगी।
नैन से नैन भी बात करने लगे,
अनकहे भाव हृद में उतरने लगे।
निर्णय अब तुम पर है राघव,
नियति को है किसने जाना,
हे राम स्वयंवर में आना।
-उदय शंकर चौधरी 'नादान'
कोलहंटा पटोरी, दरभंगा