नरपति नाल्ह (कालजयी रचनाकार)— 'बीसलदेव रासो' के रचयिता और आदिकालीन प्रेम-काव्य के अनूठे चितेरे


हिंदी साहित्य का आदिकाल केवल युद्धों और राजाओं की प्रशंसा का काल नहीं था, बल्कि यह उस भाषा का उदय काल भी था जो आगे चलकर 'हिंदी' के रूप में पुष्पित-पल्लवित हुई। इस युग के महत्वपूर्ण कवियों में नरपति नाल्ह (12वीं शताब्दी) का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उनकी कालजयी कृति 'बीसलदेव रासो' आदिकाल की उन चुनिंदा रचनाओं में से है, जिसमें वीर-काव्य की परिपाटी से हटकर 'विरह-प्रधान प्रेम-काव्य' (वियोग श्रृंगार) को प्रमुखता दी गई है।
आइए, आज 'बोधायन पत्रिका' के माध्यम से हम इस महान रचनाकार और उनके गेय-काव्य (गाने योग्य) शिल्प को नमन करते हैं।

'बीसलदेव रासो' मात्र एक ऐतिहासिक गाथा नहीं, बल्कि यह राजा बीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ) और रानी राजमती के प्रेम, रूठने-मनाने और विरह की एक अत्यंत मार्मिक गाथा है। नरपति नाल्ह ने इस रचना में 'बारहमासा' पद्धति का जो प्रयोग किया, उसने परवर्ती हिंदी साहित्य के श्रृंगार-काव्य के लिए द्वार खोल दिए।

पंक्तियाँ (राजमती का विरह):
बारह बरिस तू कुण देस बूडिया, तू देश बूडिया परदेस।
बीसलदेव! म्हारा भतार, तोय बिनु दुख पावे घणो राजमती नार॥

भावार्थ: रानी राजमती अपने पति बीसलदेव से विरह में प्रश्न करती हैं—"हे स्वामी! आप बारह वर्षों तक किस परदेस में भटकते रहे? आपके बिना मैं, आपकी पत्नी राजमती, बहुत दुखी हूँ।" यह विरह वेदना आदिकाल में नारी-हृदय की कोमल भावनाओं की एक अद्भुत मिसाल है।

नरपति नाल्ह की भाषा में राजस्थानी की मिठास है। उनकी रचनाओं को 'रासो' कहा गया क्योंकि ये गाए जाते थे। नाल्ह का काव्य जन-मानस के कंठ में बसा हुआ था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि यह रचना 'नालहे रसायन' (आनंद प्रदान करने वाला रस) है, जो लोक-जीवन के उत्सवों और विरह की पलों में गाया जाता था।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस रचना की ऐतिहासिकता पर संदेह व्यक्त किया है, परंतु वे भी इसके साहित्यिक सौंदर्य को स्वीकार करते हैं। नरपति नाल्ह ने वीर रस के बोलबाले वाले समय में 'श्रृंगार रस' की जो प्रतिष्ठा की, वह उनकी दूरदृष्टि का प्रमाण है। यह रचना हमें बताती है कि मध्यकाल में भी कवियों की दृष्टि केवल तलवारों की खनक तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे हृदय के घावों को भी उतनी ही गंभीरता से लिखते थे।

नरपति नाल्ह का साहित्य हमें सिखाता है कि प्रेम का वियोग ही वह भावना है, जो भाषा को अधिक संवेदनापूर्ण बनाती है। 'बीसलदेव रासो' आज भी राजस्थान के लोक-गायन में जीवित है। आज के दौर में, जहाँ हम प्रेम को केवल भौतिकता में ढूँढते हैं, नरपति नाल्ह का यह 'विरह-काव्य' हमें प्रेम की गहराई और धैर्य का पाठ पढ़ाता है।

साभार और संदर्भ सूची :
स्रोत ग्रंथ: बीसलदेव रासो (नागरी प्रचारिणी सभा, काशी)।
ऐतिहासिक संदर्भ: आचार्य रामचंद्र शुक्ल कृत 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (वीरगाथा काल)।

विशेष आभार: यह आलेख 'बोधायन पत्रिका' के मंच से श्रृंगार और वीर रस के इस कालजयी चितेरे, नरपति नाल्ह के प्रति सादर साभार समर्पित है।

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