"बिखरे लाल गुलाब" की बिखरी हुई मगर दमदार व संवेदनासिक्त कहानियाँ(समीक्षा)— ज्वाला सांध्यपुष्प



बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में पत्रकारिता के क्षेत्र में धूम मचाने वाले डॉ. हरि किशोर प्रसाद सिंह एकाएक कहानियाँ लिखने लग गए हों, ऐसी बात नहीं। भले ही इनकी हिंदी कहानियों का पहला संग्रह २०२२ ई. में आया है, मगर इनकी प्रायः कहानियाँ जो बयाँ करती हैं, पाठकों को अंदर से झकझोर देती हैं, उन्हें किसी पेड़ की तरह जड़ से हिला देती हैं। यही इनकी सफलता है। भले ही बिहार के नामचीन कथाकारों की सूची में इनका नाम शीर्ष पर न हो, मगर इनकी कहानियाँ ही इनकी बाहों को पकड़कर सम्मानित कथाकार के सिंहासन पर आरूढ़ करने की सिफ़ारिश करने को आतुर हैं।
"बिखरे लाल गुलाब" डॉ. हरि किशोर प्रसाद सिंह की कथा यात्रा का अनुपम और स्वादिष्ट प्रसाद है जो मुझे चार वर्षों के उपरांत मिल सका, मगर यह देवताओं पर चढ़े हुए लड्डू नहीं जो कुछ अंतराल पर फफूँदीग्रस्त होकर अखाद्य हो जाएँ, बल्कि यह तो उनकी प्रातः प्रणम्या माता जी के चरणों में समर्पित इनकी कारयित्री प्रतिभा का दस्तावेज़ है जिन्हें स्पर्श कर ही कोई धन्य हो सकता है। उच्च पारिवारिक पृष्ठभूमि में पले-बढ़े भाई हरि किशोर जी ने अपनी कहानियों में कुलीन पात्रों को ही स्थान न दिया, बल्कि आम लोगों की ज़िंदगी के दर्शन को नए अंदाज़ में प्रस्तुत कर बड़े-बड़े कथाशिल्पियों की तरह पाठकों को चौंकाने में सफल हुए हैं।
इनकी "बिखरे लाल गुलाब" ऐसी ही कहानी है जिसमें बड़े सलीके से एक मज़दूरिन की विवशता और उसकी मालकिन रेशमा के मनोविज्ञान के संतुलन को रूपायित किया गया है जहाँ दोनों महिलाएँ दुखी हैं—कामवाली दाई कामाक्षी अपने भांजे की मौत पर फूलों की माला न ख़रीद पाने के कारण दुखी है, तो मालकिन रेशमा के हृदय-गह्वर में एकाएक अपने पुराने युवा मित्र के चेहरे को याद कर सिहरन दौड़ गई जिससे कि उसके बॉस द्वारा दिए गए गुलदस्ते के लाल गुलाब के फूल गिरकर बिखर गए। मानवीय संवेदना और भावुकता के मिश्रण से निर्मित यह कथा किसी चनाज़ोरगरम से कम नहीं जिसमें कई तरह के स्वाद मिल जाते हैं।
इनकी दूसरी कहानी है—"राजस्थानी घड़ा", जिसमें राजस्थानी घड़े को मनहूस और अशुभ के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है। यह वही घड़ा है जिसकी उपस्थिति में मुख्य पात्र विकास की भाभी को कभी एक मरी हुई बच्ची पैदा हुई थी और आज जब उसकी पत्नी संगीता भी गर्भवती है, उसी तरह के नए राजस्थानी घड़े को देखते ही उसे पीड़ा होने लगी है। वाकई यह कहानी नवीन भावभूमि पर आधारित है जिसे फ़्लैशबैक में पूरी की गई है। यह कहानी शुरू से अंत तक रोचक है और हमारी संवेदनाओं को छूती है।
इसी तरह बड़ी मार्मिक कहानी है—"सेतु", जिसमें कथाकार हरि किशोर जी ने अपनी इस कहानी की नायिका शैफाली के मार्फ़त एक अनजानी युवती के बीमार पिता के इलाज में सहयोग कर जो मानवीय संवेदना का नमूना पेश किया है, क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। शैफाली ने तमन्ना के उस बीमार और वृद्ध पिता को रोगमुक्त कराने में मदद की जिसे उनका अपना ही लड़का उन्हें उम्रदराज़ और बूढ़ा कहकर इलाज नहीं करवा रहा था।
मित्र हरि किशोर जी की एक अन्य कहानी है—"नीली झील काली पड़ गई", जिसमें उन्होंने बड़ी साफ़गोई से एक ऐसे किशोर के बिगड़ जाने वाले बेहद ख़राब घरेलू माहौल को ज़िम्मेदार ठहराया जिसके वृत्त में रहकर मनोज नाम का यह किशोर दिशाहीन हो गया। लेखक ने बड़े सलीके से जिन दृश्यों का चित्रांकन किया है, यथार्थ के क़रीब है। इसमें प्रयुक्त लोकभाषा बज्जिका और दूसरी लोकभाषाओं के शब्दों के प्रयोग के चलते इसमें आंचलिकता ज़बरदस्ती घुसती हुई नज़र आती है। कभी-कभी तो लगता है कि लेखक ने ग़लत कथानक का चयन किया है, मगर ऐसी बात नहीं है। ऐसे अनछुए विषय भी हमारे बिगड़ते बच्चों को नई दिशा दे सकते हैं। और तो और, लेखक ने अपने शब्दों और रूपकों को बड़ी समझदारी और संयम से प्रयुक्त कर इसे फूहड़ व कोकशास्त्रीय कथा होने से बचा लिया है। अतः ऐसी कहानी पाठकों को अवश्य पढ़नी चाहिए।
फ़िल्मी कथा-सी लगने वाली कहानी "मुश्किल फ़ैसला" में नारी को आत्मनिर्भर होने की बात कही गई है। कथानक में अंगूरी नाम की युवती के साहस और नारी-विमर्श पर केंद्रित वक्तव्यों ने उसमें नायिका के सारे गुण भर दिए हैं। इस कहानी में संदेश तो बहुत ही उत्तम है।
एक और मार्मिक कहानी है इस संग्रह में, जिसका अटपटा-सा शीर्षक है—"पत्ता शाहबतूत का", जिसमें रेवा नाम की चौदह वर्षीया युवती की ऐसी कथा है जो माँ तो न बन सकी, मगर उसे उसके ससुराल वालों ने माँ बना दिया—ज़बरदस्ती किसी की नन्ही-सी बच्ची को उसकी गोद में थमा गए और उसके बाद उसकी ज़िंदगी मायके में अपनी माँ के संग अभाव में ही गुज़ारनी पड़ रही है, जबकि उसका सिपाही पति भी आकर कुछ आर्थिक मदद करने की जहमत ही नहीं उठाता बल्कि केवल चिट्ठियाँ ही भेजकर पति होने का फ़र्ज़ निभाता है; मगर रेवा भी पता नहीं किस पत्थर की बनी है कि वह उसके लिफ़ाफ़े को खोलती तक नहीं। ऐसी ही ग़ज़ब की कहानी के अप्रतिम लेखक हैं हरि किशोर जी जिनकी लेखन-शैली ने हमें अचंभित कर दिया है।
"साकार दीखते सपने" कहानी में लेखक ने पेशेवर नर्तकी हिना के बदलते हुए पारिवारिक जीवन के कथ्य को केंद्र में रखकर कथा का विस्तार किया है। इस कथा का संदेश यह है कि समाज की मुख्य धारा से विलग रहकर बहुत सी ज़िंदगियाँ घुट-घुटकर जीती हैं और समाज में नर्तन कला को लोग हेय दृष्टि से देखते हैं। लेकिन इसमें दिखाया गया है कि कैसे प्रियांशु के माता-पिता ने न सिर्फ़ कोठे से लाई गई नर्तकी हिना को बहू के रूप में अपनाया, बल्कि पोती सुहैल के नाचने के शौक़ के प्रति नाराज़गी न दिखाकर उसे प्रोत्साहित भी किया।
मगर कहानी और लघुकथा के झूले पर झूलती एक कहानी "पश्चाताप" भी है जिसे कथाकार ने जिस कलात्मकता से प्रस्तुत किया है कि कम शब्दों को व्यय कर भी इन्होंने इसे जो भावनात्मक ऊँचाई प्रदान की है, पाठक सोचने को विवश हो जाते हैं कि जिस "मैं" सर्वनाम से संबोधित पात्र ने बिजली मिस्त्री समझकर जिससे काम ले लिया और उसने कोई मज़दूरी भी न ली, जिसके फलस्वरूप उस "मैं" के हिस्से में केवल शर्मिंदगी ही बची। यह कहानी भी लघुकथा के बहुत ज़्यादा क़रीब है।
आलोच्य कहानी संग्रह में कहानियों के रैपर में परोसे गए जो छब्बीस तरह के आइटम हैं, उनमें यही केवल आठ ही कहानियाँ हैं जो अपने स्वाद, संस्कार और शिल्प के कारण कहानी कहलाने की क्षमता रखती हैं; बाकी के 'आइटम्स' जो इस मिष्ठान्न भरे ख़ूबसूरत डिब्बे में कहानियों के नाम पर रख दिए गए हैं—इन कहानियों के साथ कुछ ऐसी भी लघुकथाओं पर नज़र पड़ते ही लगता है मानो किसी ने सौ के नोटों की गड्डी में दस-दस के नोट घुसा दिए हैं। इससे कथाकार की विश्वसनीयता श्रीहीन होती है। तो दार्शनिक अंदाज़ में लिखे गए कुछ आलेख तो ऐसे दीखते हैं, रसमलाई की प्लेट में रखी गईं जलेबियों की मानिंद पाठकों की हँसी उड़ा रहे हैं जिसके दोषी न सिर्फ़ कथाकार बल्कि इसके सुप्रसिद्ध भूमिका लेखक और शुभकामनाएँ देकर पाठकों को पठनीयता की दृष्टि से अनुशंसित करने वाले विद्वज्जन भी हैं।
इस संग्रह में अच्छी कहानियाँ होने के बावजूद भी इसमें की व्यापक गलतियाँ या मुद्रणदोष हमें असहज करते हैं।
बावजूद इसके, इन कहानियों के साथ-साथ इनकी कुछ लघुकथाएँ स्वादिष्ट व प्रभावशाली भी हैं जिसके लिए कथाकार मित्र डॉ. हरि किशोर प्रसाद सिंह निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं और उनसे अपेक्षा है कि इसके अगले संस्करण में नए संस्कारों के साथ अपनी इन संवेदनासिक्त कहानियों को प्रस्तुत करेंगे।

-ज्वाला सांध्यपुष्प 
संयोजक: परंपरा
शाहपुर पटोरी, समस्तीपुर।

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