'हो गई है पीर पर्वत-सी': एक ग़ज़ल, जो जन-आंदोलन का मंतव्य बनी (दुष्यंत कुमार)


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, पर्दों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

- दुष्यंत कुमार 


हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ रचनाएँ केवल पढ़ी या सुनी नहीं जातीं, बल्कि वे सीधे इतिहास के पन्नों पर दर्ज होकर आंदोलनों का झंडा बन जाती हैं। दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल "हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए" एक ऐसी ही हुंकार है, जिसने 1970 के दशक में भारतीय राजनीति और समाज की नींद उड़ा दी थी।

यह रचना 1970 के दशक के मध्य (1974-1975 के दौरान) लिखी गई और दुष्यंत जी के प्रसिद्ध ग़ज़ल-संग्रह 'साये में धूप'  में शामिल हुई।
यह वह दौर था जब भारत की स्वतंत्रता को 25 से अधिक वर्ष बीत चुके थे, लेकिन आम नागरिक के सपने टूट रहे थे। देश में भयंकर महँगाई, बेरोज़गारी, खाद्य संकट और भ्रष्टाचार का बोलबाला था। स्वतंत्रता संग्राम के समय जनता ने जिस 'स्वराज' की कल्पना की थी, वह आम आदमी की पहुँच से बहुत दूर जा चुका था।

इस रचना का सीधे तौर पर संबंध 'जेपी आंदोलन' (जयप्रकाश नारायण का छात्र एवं जन-आंदोलन / संपूर्ण क्रांति) से है:

गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन (1974): महँगाई और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ पहले गुजरात के छात्रों ने आवाज़ उठाई।
बिहार छात्र आंदोलन और संपूर्ण क्रांति: इस आग ने बिहार का रुख़ किया, जहाँ जयप्रकाश नारायण (जेपी) के आह्वान पर हज़ारों-लाखों युवा सड़कों पर उतर आए।

 दुष्यंत कुमार इस आंदोलन की वैचारिक तपन को महसूस कर रहे थे। उन्होंने देखा कि सत्ता में बैठे लोग आम जनता के दुख-दर्द से बेख़बर हो चुके हैं। इसी सामाजिक-राजनीतिक जड़ता और 'पीर' (पीड़ा) को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने इस ग़ज़ल की रचना की।

यह ग़ज़ल केवल एक साहित्यिक रचना बनकर नहीं रही, बल्कि इसने भारतीय समाज और राजनीति पर एक अमिट छाप छोड़ी:

जेपी आंदोलन के दौरान रामलीला मैदान से लेकर देश के हर कोने में युवा इस ग़ज़ल की पंक्तियों को दीवारों पर लिखते थे और नारों के रूप में गाते थे:
"सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।"

दुष्यंत कुमार से पहले हिंदी/उर्दू ग़ज़ल को ज़्यादातर प्रेम, महबूब और मयख़ाने (शराब) तक सीमित माना जाता था। दुष्यंत जी ने ग़ज़ल को आम आदमी की रसोई, उसके फटे कपड़ों और उसके राजनीतिक आक्रोश की भाषा बना दिया।

1975 में आपातकाल लागू होने के बाद भी यह रचना भूमिगत आंदोलनों का संबल बनी रही। इसने जनता के भीतर यह विश्वास जगाया कि सत्ता चाहे कितनी भी निरंकुश क्यों न हो, "मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।"

"हो गई है पीर पर्वत-सी" केवल 1975 के भारत का चित्र नहीं है, बल्कि यह हर उस दौर और समाज का दर्पण है जहाँ व्यवस्था संवेदनहीन हो जाती है। जब-जब समाज में शोषण, भ्रष्टाचार या अन्याय बढ़ेगा, तब-तब दुष्यंत कुमार की यह ग़ज़ल एक मशाल बनकर राह दिखाती रहेगी।

- बोधायन पत्रिका 


एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका