बित्ते भर की चोरनी (संस्मरणात्मक लघुकथा) - डॉ. प्रीति सुमन

पाँच-छह साल की उम्र में इंसान इतना अबोध होता है कि उसे अच्छे-बुरे को समझने का होश नहीं होता। इस भोलेपन में, हम अक्सर कुछ ऐसा कर जाते हैं जिसकी कभी कोई उम्मीद नहीं कर सकता। मेरे आस-पड़ोस में मेरे साथ खेलने वाला कोई था नहीं, सो मैं अपने बड़े भैया और उनकी शातिर मंडली के पीछे दुम की तरह लगी रहती थी। भैया मुझे इतना मानते थे कि बस पूछिए मत! उनके अंदर अपनी छोटी बहन को बचाने का कोई 'प्रोटोकॉल' था ही नहीं। नतीजा यह कि हर तूफ़ानी मिशन में बलि का बकरा... सॉरी, बकरी मुझे ही बनाया जाता था।
एक बार जेठ की कड़कड़ाती दुपहरिया में इस टोली ने एक 'हाई-लेवल सीक्रेट मीटिंग' बुलाई। मिशन था—चाचा के बागीचे से रसीली लीचियों की 'सर्जिकल स्ट्राइक'!
चाचा घर में खर्राटे ले रहे थे। रणनीति ऐसी बनी मानो किसी देश पर चढ़ाई करनी हो। पर सवाल था कि अंदर घुसेगा कौन? सबकी नज़रें मुझ पर आकर टिक गईं।
"यह छोटी जाएगी! हम सब मकई के खेत से इस पर पूरी नज़र रखेंगे। कोई ख़तरा हुआ, तो 'बैकअप टीम' की तरह कूद पड़ेंगे," टोली के लीडर ने मुझे कमांडो वाला भरोसा दिया। मुझे लगा भैया बोलेंगे—'नहीं, यह तो बुद्धू है, इसके बस का नहीं।' पर भैया ने भी ऐसे सिर हिलाया मानो मैं इसरो की कोई साइंटिस्ट हूँ।
बस, मुझे आगे धकेल दिया गया। भैया और उनकी पलटन मकई के खेत में छिप गई, जहाँ से उनके सिर भुट्टों की तरह बाहर झाँक रहे थे।
मैं सूखी घास पर ऐसे दबे पाँव चल रही थी जैसे मोगली जंगल में चलता है। मैं पेड़ के नीचे पहुँची, डालियाँ झुकी हुई थीं। मैंने एक लाल-लाल लीची का गुच्छा पकड़ा और अभी 'कड़ाक' से तोड़ा ही था कि... ठीक उसी पल किसी विलेन की तरह एंट्री हुई हमारे चाचा की!
दौड़ते हुए चाचा मेरे पास आए और दहाड़ते हुए बोले—"कौन है रे वहाँ बागीचे में?"
वह आवाज़ क्या थी, मानो किसी ने रिमोट का बटन दबा दिया हो। मकई के खेत में जो चार-पाँच सिर दिख रहे थे, वे सब एक सेकंड में ऐसे गायब हुए जैसे योग शिविर में 'शवासन' चल रहा हो; संतरी धूल उड़ाते भागे और मेरे रक्षक भैया? वह तो मकई के पत्तों में ऐसे विलीन हुए कि ढूँढने से न मिलें।
अब बागीचे के बीचों-बीच बची सिर्फ मैं! हाथ में लीची का इकलौता गुच्छा थामे, मैं ज़मीन पर ऐसे फिक्स हो गई जैसे सीमेंट का पुतला। मुझे सारी बातें समझाई गईं पर पकड़े जाने के बाद भागना कैसे है, यह नहीं समझाया गया था। मुझे कल्पना में भी ऐसे क्षण का विचार नहीं आया था। चाचा ने लपककर कान उमेठा और चीखते हुए कहा, "चोरनी कहीं की! तब मुझे पता चला कि जो मैंने किया उसे चोरी कहते हैं। भय और बढ़ने लगा जब चाचा के अगले शब्द कानों में पड़े—'चल घर! बताता हूँ। बित्ते भर की हुई नहीं कि खानदान का नाम ऊँचा करने लगी है।'"
उन्होंने बढ़िया से डाँटा और कान पकड़कर हिला दिया। जब मैंने घूमकर मकई के खेत की तरफ देखा, तो वहाँ सन्नाटा था। हवा से पत्ते ऐसे हिल रहे थे मानो चिढ़ा रहे हों—'बेटा, तू तो गई !'
मुझे तो यह अचंभा हो रहा था कि अभी तो इतने सारे सिर दिख रहे थे, ये सब जादू की तरह गायब कैसे हो गए! उस दुपहरिया मुझे दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान प्राप्त हुआ कि चोरी करने से पहले भागना कैसे है, यह सीखना चाहिए। मुझे अपनी गलती का आज भी अफसोस है कि मैं भागी क्यों नहीं लेकिन इसके बाद कभी न मैंने चोरी की, न कभी भागने की नौबत आई। सिखा ज्ञान सीख बनकर ही रह गया।
ऐसा नहीं कि इसके बाद मैंने शरारतें छोड़ दीं या मैं बहुत समझदार हो गई; आगे भी मैंने ऐसे ही कई कांड किए; आखिरकार बचपन का असली मज़ा तो ऐसे ही अलबेले काम करने में है।


- डॉ. प्रीति सुमन 
सीतामढ़ी, बिहार 

2 टिप्पणियाँ

  1. इस अत्यंत रोचक लघुकथा को पढ़कर आनंद आ गया 🙏
    यादें ताज़ा हो गईं

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