लक्ष्मी ( लघुकथा) - सागरिका रॉय


रश्मि ने चहकते हुए चाय की प्याली मोहित के आगे रखी, तो मुस्कुराते हुए वह पूछ बैठा— "आज की पिकनिक कैसी रही मैडम?"
रश्मि ने खनकते स्वर में कहा— "बहुत, बहुत ही बढ़िया! मज़ा आ गया। AC ट्रैवलर और AC हॉल, गर्मी का तो पता ही नहीं चला। इतने सारे गेम्स, स्नेक्स, गाना, नाचना... काश तुम भी साथ होते!"
"लेडीज़ पार्टी में मैं कैसे साथ होता?" मोहित ने हंसते हुए कहा।
"अच्छा हाँ," रश्मि ने कहा— "तुम्हारा दिन कैसा रहा?"
चाय की प्याली टेबल पर रखते हुए मोहित ने कहा— "कुछ खास नहीं, आज गर्मी बहुत थी। दुकान पर बिजली ठप्प होने के कारण ग्राहक लौट रहे थे। दिनभर में मात्र 1500 की ही बिक्री हुई।"
रश्मि के चेहरे पर उदासी थी, जिसे मोहित महसूस कर पा रहा था। दबी आवाज़ में रश्मि बोली— "सुनो न, ट्रैवलर का मेरे हिस्से का एक हज़ार GPay करना होगा आज ही।"
मोहित बिना समय गँवाए मोबाइल उठाकर बोला— "किस नंबर पर?"
रश्मि उदास होकर सोच रही थी कि मेहनत से आई धनलक्ष्मी मिनटों में चली गई, और दूसरी ओर मोहित खुश हो रहा था कि उसकी कमाई की धनलक्ष्मी उसकी प्यारी गृहलक्ष्मी की खुशी में खर्च हुई।
दोनों ही एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए— सम्मान और स्नेह के साथ।


- सागरिका रॉय 
पटना, बिहार 

प्रकाशित पुस्तक ___अनहद स्वर ।


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