नदी मरी तो... (नवगीत) - भगवती प्रसाद द्विवेदी


नदी एक
मर गई आज
मेरे जवार की।
नदी मरी तो
मरीं मछलियाँ
जल बिन तड़प-तड़प,
मछली बिन
मछुआरों की
रोज़ी ली गई हड़प,
बाट जोहती
नाव खड़ी
नाविक-सवार की।
मरे सभी
जल-जंतु
वनस्पतियों ने दम तोड़ा,
राहगीर
प्यासे पशु-पक्षी
हंसों का जोड़ा,
मिटी चुहल
लहरों के संग
अल्हड़ बयार की।
हलके के
खेतों की
खुशहाली पर ग्रहण लगा,
तिरवाहीं के
वृक्ष सोचते
किसने दिया दगा?
हुई किसानी-
खेती अब
जिनगी पहार की।
नदिया एक
मरी तो
अपने गाँव उजाड़ हुए,
लुप्त लोक की
हुई चहक,
संस्कृति के मरे कुएँ,
तिल-तिल मरते
जीवन की
यह कथा हार की।
नदी एक
मर गई आज
मेरे जवार की।


- भगवती प्रसाद द्विवेदी 
वरिष्ठ साहित्यकार, पटना
         बिहार 

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