पुरुष होने की कीमत (छंदमुक्त) - वर्षा वसी


सिर्फ स्त्री देह ही
नहीं बंधी है रूढ़ियों की ज़ंजीरों में,
पुरुष मन भी बंधा है!
माता-पिता, भाई-बहन
या जवान बेटे की मृत्यु पर
तुम सभी रोकर
कर लेते हो मन को हल्का,
किंतु
मेरा हृदय दुख से चीत्कार उठता है,
फिर भी इन तप्त आँसुओं में
मुझे प्रतिपल उबलना पड़ता है!
क्योंकि
पुरुष होने की सज़ा
नज़र आती है सामने,
कि जब जूझते हैं मेरे बच्चे
कई असफलताओं से,
धैर्य में सफलता को
बताता हूँ सलीके से।
आखिर कब तक मैं
इन आँखों में
अपने आँसुओं को रोक रखूँगा?
जो होऊँ कभी 'चुनौती-मुक्त पुरुष',
तो जी भरकर मैं भी कभी
तुम-सा रो लूँगा!
मेरी आँखों के अंदर
लहराते हैं समंदर,
तप्त आँसू मन के भीतर
मारते हैं खंजर!
इसी कशमकश में
मैं तमाम जीवन जी रहा हूँ,
अथाह आपदा से लड़कर
मैं आँसुओं को पी रहा हूँ।
मन और दृष्टिकोण के बीच
समाज ने लगा रखा है
'पुरुष चुनौती' का पर्दा,
जिसके पीछे छिपाए जाते हैं
पुरुषों की अनेक यंत्रणाएँ!
आँखों के चिलमन में
छुपा रखा है पानी,
कहीं आँखों से उतरकर
गढ़ न दे
कायर पुरुषों की कहानी!
मैं पूछता हूँ...
मैं पूछता हूँ...
कि आखिर पुरुष होने की
कितनी कीमत चुकानी होगी ऐ ख़ुदा?
या
इस दुख-रूपी महासागर में डुबोकर
करोगे इस संसार से मुझे विदा?



— वर्षा वसी
  नालंदा, बिहार 



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