मेले में अब खिलौने खरीदे नहीं गए,
मजबूर बाप देख के रोने नहीं गए।
ज़ाहिर न हो कि चाहता है कोई और भी,
हम चाँद पर भी दाग़ ये कहने नहीं गए।
हमको वो तौलते हैं तराज़ू की नोक पर,
देखा 'नई रईसी'—चमकने नहीं गए।
हम उस गली में डर रहे जाने से आज भी,
रुतबा अलग है—जान से मिलने नहीं गए।
सूरज को प्यार चाँद से, पर कहता क्यों नहीं?
मायूस तारे दिन में चमकने नहीं गए।
— सूरज तिवारी
भदोही, उत्तर प्रदेश
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