स्मृति सुख(लघुकथा)- अरुण कुमार जैन


​बूढ़ी दादी ने ज्यों ही बड़े सहेज कर रखी गई अपनी सबसे कीमती चीज़ की पोटली खोलकर भीतर से निकाली, सभी खिलखिलाकर हँस पड़े। वे चाँदी के एक-एक रुपये के बीस सिक्के थे।

​नगर के धनाढ्य परिवार की मुखिया रुक्मिणी दादी अपने नाती-पोतों को साठ-पैंसठ साल से सहेज कर रखी, अपने जीवन की अमूल्य संपत्ति बता रही थीं।

​"अरे! यह भी कोई धन है? इससे तो एक बर्थडे पार्टी का पेमेंट भी नहीं होगा," छोटा मोनू व्यंग्य से बोला।

​"जब मैंने अपनी सोने की चूड़ियाँ बेची थीं, तब इस तरह के चालीस चाँदी के सिक्के मिले थे। बीस से तुम्हारे दादा जी ने अपने व्यापार की शुरुआत की व सफलता के शिखर तक पहुँचे और ये बीस मुसीबत के दिनों के लिए संभाल कर रखे गए थे," दादी ने इन सिक्कों का महत्त्व बताया।

​पर बच्चों के मुँह पर गौरव व संतोष के भाव नहीं थे।

​"ये बीस... इन्हें साठ साल तक अंधेरे में रखा गया... उजाले की एक भी किरण नहीं देख पाए ये बेचारे... नहीं तो ये भी वटवृक्ष बन जाते। पर फर्क क्या पड़ता है... ये तुम्हारे दादा जी की अनमोल अमानत हैं मेरे लिए," कहते-कहते दादी की आँखें छलछला उठीं।

​उन्होंने अपने स्वर्गीय पति की अमानत को फिर से पोटली में बाँधकर रख दिया, स्मृति सुख पाने के लिए।


- अरुण कुमार जैन 

संपर्क - अमृता हॉस्पिटल, सेक्टर 88, फ़रीदाबाद, हरियाणा।


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