रीतिकाल का साहित्य अधिकांशतः राजाओं की विलासिता और नायिका-भेद के वर्णन में डूबा हुआ था, परंतु इस भीड़ से अलग एक ऐसा कवि था जिसने अपनी लेखनी को तलवार की धार के समान तीखा रखा। वह कवि थे—महाकवि भूषण (1613–1705)। छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराज छत्रसाल के पराक्रम का जैसा सजीव वर्णन भूषण ने किया, वैसा हिंदी साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है।
भूषण का काव्य भारतीय इतिहास के गौरवशाली क्षणों का दस्तावेज़ है। उन्होंने अपने आश्रयदाता शिवाजी महाराज की वीरता का वर्णन करते हुए जो ओज पैदा किया, वह आज भी पाठकों में राष्ट्रप्रेम की भावना जागृत कर देता है।
पंक्तियाँ :
इंद्र जिमि जंभ पर, बाड़व सुअंभ पर, रावन सदंभ पर, रघुकुल राज हैं।
पौन बारिवाह पर, संभु रति नाह पर, ज्यो सहसबाहु पर, राम द्विजराज हैं॥
भावार्थ: जैसे इंद्र का जंभ पर, बड़वानल का समुद्र पर, रघुनाथ जी का रावण पर, पवन का बादलों पर और परशुराम जी का सहस्रबाहु पर प्रभुत्व है, ठीक वैसे ही मुगलों पर छत्रपति शिवाजी महाराज का शासन है।
भूषण ने केवल कल्पनाओं में काव्य नहीं रचा, बल्कि वे ऐतिहासिक घटनाओं के साक्षी थे। उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ 'शिवराज भूषण', 'शिवा बावनी' और 'छत्रसाल दशक' इतिहास और साहित्य का एक अद्भुत संगम हैं। उन्होंने शिवाजी के व्यक्तित्व के साथ-साथ उनके प्रशासन और नीति-कुशलता का भी यशोगान किया है।
भूषण की भाषा में ओज, प्रवाह और वीर रस का भरपूर संचार है। उन्होंने अनुप्रास और उपमा अलंकारों का ऐसा प्रयोग किया है कि कविता सुनते ही मन में युद्ध का दृश्य सजीव हो उठता है। उनका काव्य हमें याद दिलाता है कि एक कवि की लेखनी समाज की सोई हुई चेतना को जगाने का सबसे सशक्त माध्यम है।
भूषण का साहित्य हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन समय में भी यदि कवि अपने दायित्व को पहचान ले, तो वह इतिहास को अमर कर सकता है। वे रीतिकाल के उस झिलमिलाते दीप की तरह हैं, जिसने अपने 'वीर रस' के प्रकाश से पूरे युग की विलासिता को चुनौती दी।