देखो जी ! दरबार सजा है(गीत गंधी ग़ज़ल) - आचार्य विजय गुंजन


देखो जी! दरबार सजा है
चापलूस को बड़ा मजा है ।

राजा सिंहासन पर बैठा
गाँधी जी की लिए अजा है ।

सद्विवेक अब पानी भरता
बुद्धिमान की हुई कजा है ।

चाटुकार गुणकीर्तन करता
मस्ती की उड़ रही ध्वजा है ।

राजा चाहे ठकुरसुहाती
विज्ञ भारती रही लजा है ।

बिगड़ी बात बनेगी कैसे
चुगलखोर की नहीं रजा है ।

बदले की भावना प्रवल में
धूमिल अब हो गई फ़िजा है ।

तुम अब झाल बजाओ गुंजन
तुमको तो बस यही सज़ा है ।


       - आचार्य विजय गुंजन
               पटना, बिहार 

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