देखो जी! दरबार सजा है
चापलूस को बड़ा मजा है ।
राजा सिंहासन पर बैठा
गाँधी जी की लिए अजा है ।
सद्विवेक अब पानी भरता
बुद्धिमान की हुई कजा है ।
चाटुकार गुणकीर्तन करता
मस्ती की उड़ रही ध्वजा है ।
राजा चाहे ठकुरसुहाती
विज्ञ भारती रही लजा है ।
बिगड़ी बात बनेगी कैसे
चुगलखोर की नहीं रजा है ।
बदले की भावना प्रवल में
धूमिल अब हो गई फ़िजा है ।
तुम अब झाल बजाओ गुंजन
तुमको तो बस यही सज़ा है ।
- आचार्य विजय गुंजन
पटना, बिहार