न जाने क्यों मुझे मेरा शहर अच्छा नहीं लगता! (कविता) - अभिलाषा सिंह

न जाने क्यों मुझे मेरा शहर अच्छा नहीं लगता

कई सड़कें चकाचक बन गईं
हैं पुल बने इतने
मगर निकले जिधर भी
जाम ही बस जाम हैं कितने

कि माथा घूम जाता है
न गाड़ी घूम पाती जब
जिधर देखो लगी है भीड़
कम यह भीड़ होगी कब?

सुकूँ से घर पहुँचने का सफर सच्चा नहीं लगता
न जाने क्यों.........

यहाँ हर चीज़ है सो जिंदगी आसान लगती है
मगर कुदरत यहीं मानो
बड़ी बेजान लगती है।

कि अब वातानुकूलित यंत्र
उगले जहर भर - भर कर
गरजती गाड़ियाँ रहतीं
रहम करतीं न कानों पर।

प्रदूषण से बचा हो वृद्ध या बच्चा, नहीं लगता।
न जाने क्यों........
अगर हम गाँव को सुविधाजनक कुछ और कर लेते
किशिक्षा,स्वास्थ्य,सड़कें
सौर,शहरों की तरह देते

वहाँ अब भी हवाएँ 
शुद्धता के साथ बहती हैं 
कई रंगीन चिड़ियाँ 
पत्तियों में ही चहकती हैं

वहाँ श्रमसाध्य है जीवन,कहीं गच्चा नहीं लगता
न जाने क्यों.......

कवयित्री
अभिलाषा सिंह 
शिक्षिका
पटना, बिहार 

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