ख़ूबसूरती(लघुकथा)- ज्वाला सांध्यपुष्प

​प्रवचन श्रवण हेतु विशाल पंडाल में श्रद्धालु बैठ चुके थे। बस थोड़ी ही देर में रामकथा वाचक आशाराम बापू मंच पर पधारने वाले थे। वाद्ययंत्रों की मधुर-मंद सांगीतिक ध्वनि के बीच, जो महिला कार्यकर्ता उद्घोषणा कर रही थी, उसे देखकर पंडाल में बैठी दो महिलाएं आपस में बतियाने लगीं—

​"यह छोरी तो काफी सुंदर लग रही है बहन! देखो न, दूर से ही चमक रही है," शकुंतला देवी ने अपनी कोहनी बगल में बैठी सहेली बनारसी देवी की पसली में सटाते हुए कहा।

​— "है तो, मगर दूर के ढोल सुहावने लगते ही हैं। पता नहीं, चेहरे पर कितने मन पेंट चिपका रखी होगी! हमारे वो तो कहा करते हैं कि चमकने वाली हर वस्तु सोना नहीं होती।"

​बनारसी देवी बोल गईं, तो शकुंतला देवी से भी रहा नहीं गया— "कैसे कहती हो दीदी! तुम्हीं अपनी बहू को देख लो, कितनी सुंदर, सुशील और सलीकेदार है। उसके सामने तो यह पानी भरती नज़र आएगी।"

​— "कौन-सा राग अलाप गई हो बहन, तुम भी! सुंदरता अगर सिर्फ़ गोरी चमड़ी से मापी जाती, तो सभी विलायती लड़कियां विश्व सुंदरी न बन जातीं? मेरी बहू का रंग गोरा ज़रूर है, मगर ढंग...?" बोलते हुए बनारसी देवी का गला रुंध गया।

​और उधर, मंच पर जयकारे के बीच आशाराम बापू पधार चुके थे।


लघुकथा: ख़ूबसूरती

ज्वाला सांध्यपुष्प

समस्तीपुर, बिहार

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