आँसू...
अब नहीं बहते आँखों से,
कि इसकी ज़बाँ सबको पढ़नी नहीं आती।
सच...
कहना तो मुश्क़िल हुआ बहुत,
कि यहाँ झूठ की सियासत सबको पकड़नी नहीं आती।
दर्द...
दबा रखा है सीने में कहीं,
कि हर चौखट पर तो दास्ताँ सुनाई नहीं जाती।
ग़म...
हमसफ़र बना है जबसे मेरा,
किसी और से फिर यारी निभाई नहीं जाती।
ख़ामोशी...
अज़ीज़ हो गई है इस कदर,
कि यह बिन कहे भी बहुत कुछ कहा करती है।
और यह ज़िंदगी...
न जाने क्यों इतनी बेपरवाह है,
जो न चाहकर भी चुपचाप सबकुछ सहा करती है।।
- डॉ. प्रीति सुमन
संपादक
बोधायन पत्रिका
प्रीति मैम आपने इस कविता के माध्यम से समाज में फैले 'झूठ के सियासत ' और हर किसी के सामने अपने दर्द को न जाहिर करने की मजबूरी को बेहद ख़ूबसूरती से दर्शाया है, साथ ही खामोशी को एक साथी के रूप में दिखाने की कोशिश कीं है, जो बिना कुछ कहे भी जिन्दगी के गहरे सच को बयां कर जाती है। अंतर्मन तक छु जाने वाली कविता। सच आप सभी की कविताओं को पढ़कर बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। बहुत-बहुत आभार आपका।
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