आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल ने अपने कथ्य, शिल्प, भाषा, भाव, प्रभाव, सांस्कृतिक बोध तथा सामर्थ्य के बल पर हिन्दी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा के रूप में स्वयं को स्थापित किया है और पाठकों को कविता के नए स्वाद से परिचित करवाया है। इसका प्रत्येक शेर अपनी विषयवस्तु के दृष्टिकोण से अपना एक अलग और पूर्ण अस्तित्व रखता है। एक ग़ज़ल के विभिन्न शेरों में बहुत कुछ कह देने की गुंजाइश बनी रहती है; यही कारण है कि पाठक को भी एक अलग ही आनंद का अनुभव होता है। यह विशेषता मात्र इसके अंदाज़ और इसके लहजे की है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसी और विशेषताएँ भी हैं, जिनकी चर्चा अलग से किए जाने की आवश्यकता है।
ग़ज़ल लेखन और इसके प्रति समर्पण के मामले में घनश्याम जी एक ऐसे विलक्षण ग़ज़लकार हैं, जिनकी मिसाल बहुत कम मिलती है। इन्होंने अपनी ग़ज़लों को एक पूरी उम्र दी है, जिसे इन्होंने जिया भी और जिसके प्रति स्वयं को समर्पित भी किया। आज हमारे बीच नहीं रहने के बावजूद इनकी ग़ज़लें हमें झकझोरती भी हैं और एक मीठी पीड़ा भी देती हैं। अभी तो उन्हें और जीना था, ग़ज़ल के आँचल में कई रंग-बिरंगे फूल भरने थे; मगर नियति अपना काम करने से कहाँ चूकती है! हमारे सारे हौसले और संकल्प धरे के धरे रह जाते हैं। कुछ ऐसा ही घनश्याम जी के साथ हुआ। इनके भीतर कई संकल्प अभी अंगड़ाइयाँ ले रहे थे, इसी बीच नियति अपना क्रूर काम कर गई और वे अपने परिवार, मित्र और साहित्य से नाता तोड़कर दूर चले गए। हमारी आँखें खुली की खुली रह गईं।
घनश्याम जी की ग़ज़लें इस दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हो जाती हैं कि इन्होंने नए युग की नई परिस्थितियों से उत्पन्न यथार्थ को पहचाना और नए समाज की नई उमंगों से आत्मसात कर उसके आत्मविश्वास को अपनी ग़ज़लों के माध्यम से आगे बढ़ाने का काम किया। अपनी ग़ज़लों में वे समकालीन व्यवस्था की तीखी आलोचना करते हैं, पाठक को व्यवस्था में व्याप्त बुराइयों से लड़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, झकझोरते हैं और उठकर खड़े होने की प्रेरणा देते हैं। उनका यथार्थवाद कोई ओढ़ा हुआ यथार्थवाद नहीं है; यही कारण है कि उनके लेखन में निराशा, विरक्ति या पलायनवादी रुझान कभी हावी नहीं हो पाया। उनकी ग़ज़लें परिस्थितियों के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करतीं, वरन कठिन से कठिन बाधाओं के बीच भी अपनी मजबूत उपस्थिति का अहसास करवाती हैं और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ती हैं। एक सत्य यह भी है कि आधुनिक समाज की बुराइयों और अन्यायों का यथार्थ चित्रण करने के साथ-साथ, घनश्याम जी का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि वे धीरे-धीरे उन बुराइयों को पहचानने और समझने का प्रयास करते हैं जो जीवन में सुंदर और मूल्यवान हैं। वे एक नई दुनिया का स्वप्न देखते हैं। इस स्वप्न में सारे समाज की जागृति, उसकी एकता और उसके नैतिक उत्थान में उन्हें नई संस्कृति के द्वार खुलते दिखाई देते हैं....
शुद्ध अन्तःकरण नहीं मिलता / स्वस्थ वातावरण नहीं मिलता
हाथ पर हाथ मत धरे रखिए / मुफ्त पोषण-भरण नहीं मिलता
अलग तुमसे नहीं मेरी कथा है / तुम्हारी ही व्यथा मेरी व्यथा है
समय का दोष है या आदमी का / सदा ऐसे सवालों ने मथा है
भूत भय-भीरुता के भगा दीजिए / सुप्त निर्भीकता को जगा दीजिए
हो रही हों जहाँ पर घृणित साज़िशें / आग उस कोठरी में लगा दीजिए
सामाजिक अन्याय पर तीखा प्रहार और आम आदमी के साहसपूर्ण कार्यों तथा उसके आदर्शों का पुष्टपोषण—इन शेरों का कलात्मक सम्मिश्रण ही घनश्याम जी की ग़ज़लों की मुख्य विशेषता है। इस पुस्तक में जितनी भी ग़ज़लें हैं, यदि उन्हें ध्यानपूर्वक देखा जाए तो पता चलेगा कि हमारे सामने आँखों को कंपा देने वाला वर्तमान है, जिसमें जीवन की धड़कन पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। घनश्याम जी ने पहले अपनी ग़ज़लों में यथार्थ का चित्रण कर वास्तविक स्थिति की विषमता का उद्घाटन किया है और फिर अपनी आदर्शवादी कल्पनाओं के अनुसार उसका हल भी निकालने का प्रयास किया है। वह सामाजिक विषमता के लिए किसी व्यक्ति विशेष को दोषी न ठहराकर सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था को ही इसके लिए जिम्मेदार मानकर उसे बदलना चाहते हैं। इसलिए उनके इन दोनों दृष्टिकोणों में एक मौलिक और सुंदर संतुलन दिखाई देता है।
यह सफ़र कामयाब कब होगा / और पूरा यह ख़्वाब कब होगा
जुल्म अब तो सहा नहीं जाता / बोलिए इन्क़लाब कब होगा
प्रत्येक व्यक्ति में सौंदर्य-भावना होती है और वह अपनी मान्यता के अनुसार सब कुछ सुंदर देखना चाहता है। घनश्याम जी भी इससे अछूते नहीं हैं। जहाँ कहीं भी अवसर मिला है, उन्होंने अपनी ग़ज़लों में सौंदर्य-भावना को बखूबी प्रकट किया है। उनकी इस रुचि की परख इन शेरों के माध्यम से की जा सकती है....
जब मधुप को नज़र पंखुरी आ गई / उनके गुंजार में ताज़गी आ गई
दिल समन्दर का कितना मचलने लगा / सामने उसके कोई नदी आ गई
घनश्याम जी के पास अपनी दृष्टि और ग़ज़ल को समझने का अपना एक अनूठा नज़रिया था। उन्हें ग़ज़ल की विधायी व्यवस्था का पूर्ण ज्ञान और उसके मापदंडों की गहरी समझ थी। भाषा की चुस्ती और भावुकतापूर्ण शैली, जो ग़ज़ल की आत्मा होती है, वे उसे बखूबी समझते थे। वे हिन्दी-उर्दू के व्यर्थ विवाद से हमेशा बचते रहे। मिसरे की माँग के अनुरूप ही वे शब्दों का चयन करते थे। प्रसंग के अनुकूल शब्द, भाव और विचार उनके यहाँ सहज रूप से आते हैं; वहाँ न कोई उलझन है और न ही किसी मानसिक कसरत की गुंजाइश। उन्होंने जो भी लिखा है, वह सटीक, मारक और बेहद पठनीय है।
लेखक संपर्क:
अनिरुद्ध सिन्हा
गुलज़ार पोखर, मुंगेर (बिहार) 811201
मोबाइल: 7488542351 | ईमेल: anirudhsinhamunger@gmail.com
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