मुझे दौड़ में कछुआ पसन्द है,
हाँ, वही कछुआ जो खरगोश के साथ दौड़ा था,
इसलिए नहीं पसन्द है कि वह प्रथम आया था,
इसलिए भी नहीं कि वह महत्वाकांक्षी था,
इसलिए क्योंकि उसकी सोच जीत-हार से परे थी,
इसलिए क्योंकि वह हार की आशंका वाली दौड़ में हिस्सा लेने से नहीं डरा,
इसलिए क्योंकि वह खरगोश की तीव्र शक्ति से नहीं डरा,
इसलिए क्योंकि उसने अपनी कमजोरी का रोना नहीं रोया,
इसलिए क्योंकि कछुए को सिर्फ चलना था, निरंतर, अपने लक्ष्य की ओर,
तब तक, जब तक कि अपने ख्वाब को पूरा न कर ले।
कछुआ जानता है उसमें दौड़ की काबिलियत नहीं है, फिर भी वह जीत गया है,
वह बता रहा था कि अब वह बड़े से बड़े खरगोश से भी होड़ लेगा,
असंभव से दिखने वाले कार्य अब उसे संभव लगने लगे हैं,
इसीलिए मुझे दौड़ में कछुआ पसन्द है।
विधा: छंदमुक्त काव्य / पद्य साहित्य
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