मुझे दौड़ में कछुआ पसन्द है (कविता) — डॉ. प्रीति सुमन


मुझे दौड़ में कछुआ पसन्द है,

​हाँ, वही कछुआ जो खरगोश के साथ दौड़ा था,

​इसलिए नहीं पसन्द है कि वह प्रथम आया था,

​इसलिए भी नहीं कि वह महत्वाकांक्षी था,

​इसलिए क्योंकि उसकी सोच जीत-हार से परे थी,

​इसलिए क्योंकि वह हार की आशंका वाली दौड़ में हिस्सा लेने से नहीं डरा,

​इसलिए क्योंकि वह खरगोश की तीव्र शक्ति से नहीं डरा,

​इसलिए क्योंकि उसने अपनी कमजोरी का रोना नहीं रोया,

​इसलिए क्योंकि कछुए को सिर्फ चलना था, निरंतर, अपने लक्ष्य की ओर,

​तब तक, जब तक कि अपने ख्वाब को पूरा न कर ले।

​कछुआ जानता है उसमें दौड़ की काबिलियत नहीं है, फिर भी वह जीत गया है,

​वह बता रहा था कि अब वह बड़े से बड़े खरगोश से भी होड़ लेगा,

​असंभव से दिखने वाले कार्य अब उसे संभव लगने लगे हैं,

​इसीलिए मुझे दौड़ में कछुआ पसन्द है।


विधा: छंदमुक्त काव्य / पद्य साहित्य

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