रीतिकाल के अमर शिल्पी: महाकवि बिहारी लाल
हिन्दी साहित्य के रीतिकाल के सबसे प्रतिष्ठित कवियों में से एक महाकवि बिहारी लाल अपनी अद्भुत कल्पना-शक्ति और 'गागर में सागर' भरने की कला के लिए जाने जाते हैं। उनकी एकमात्र कालजयी कृति 'बिहारी सतसई' (सात सौ से अधिक दोहों का संग्रह) सौंदर्य, भक्ति और नीति का अनूठा संगम है।
बोधायन पत्रिका के पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं महाकवि बिहारी के कुछ अमर दोहे:
1. भक्ति रस (मंगलाचरण)
यह दोहा बिहारी सतसई का पहला दोहा है, जिसमें वे राधा जी की वंदना करते हैं:
मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।
जा तन की झाँई परै, स्यामु हरित दुति होइ।
अर्थ: चतुर राधिका जी मेरी सांसारिक बाधाओं को दूर करें, जिनके गोरे शरीर की परछाई (झाँई) पड़ने मात्र से ही श्रीकृष्ण का साँवला रंग भी प्रसन्नता से हरे रंग की कांति में बदल जाता है।
2. शृंगार रस (अद्भुत नैन-नक्श)
नायक और नायिका के बीच बिना बोले आँखों-आँखों में होने वाले संवाद का यह सबसे प्रसिद्ध दोहा है:
कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भौन में करत हैं, नैननु हीं सब बात।
अर्थ: भरे हुए भवन में, सब लोगों के सामने भी नायक और नायिका सिर्फ अपनी आँखों के इशारों से बात कर रहे हैं। नायक कुछ कहता है, नायिका मना कर देती है (नटत), नायक उसकी इस अदा पर रीझ जाता है, नायिका बनावटी गुस्सा (खिझत) दिखाती है, फिर दोनों की आँखें मिलती हैं, चेहरे खिल उठते हैं और नायिका शर्मा (लजियात) जाती है।
3. नीति रस (गंभीर सीख)
छोटे और दिखावे वाले लोगों पर चोट करता हुआ यह बहुत सुंदर नीतिपरक दोहा है:
ओछे बड़े न ह्वै सकैं, लगि सत्रहूँ ह्वै डैन।
दीरघ होहिं न कुच गरें, फारि निहारे नैन।
अर्थ: ओछे यानी छोटे दिल या छोटी सोच वाले लोग कभी बड़े नहीं हो सकते, चाहे वे आसमान छूने के लिए कितना भी क्यों न फड़फड़ाएँ। ठीक वैसे ही, जैसे अपनी आँखों को फाड़-फाड़कर देखने से भी आँखें बड़ी नहीं हो जातीं, उनका आकार वही रहता है।
साभार: बिहारी सतसई