आखिर कब तक...?(नवगीत) - अमरजीत कुमार


तू कब तक सहती रहेगी,
ये अभद्र टिप्पणियाँ?
तू कब तक देखती रहेगी,
अस्मिता की ऐसी धज्जियाँ?
दरिंदों की हवस का तू,
बनती रहेगी शिकार कब तक?
पूछती हैं देश की बेटियाँ,
आखिर कब तक, आखिर कब तक...?

तू उठ, तू वार कर, प्रहार कर,
माँ काली बन संहार कर!
मिटा दे हर जुल्म-ओ-सितम,
तू दुर्गा है स्वीकार कर!
कलयुग के कोने में जन्मे,
असुर भाव जो लिए तन में,
माँ भारती की गरिमा को,
तार-तार करते क्षण में।

भारत माँ की चीर नोचकर,
ले जाते बेटी दबोचकर,
तेरे देश के लोग बैठे,
न जाने क्या हैं सोचते!
उन्हें लाज नहीं, परवाह नहीं,
इज्जत बचाने की चाह नहीं,
निर्लज्ज बैठे अपराधी जो,
करते निरंतर जालसाजी ही।

बाण, तीर, अस्त्र-शस्त्र उठाकर,
दुष्ट दैत्यों को मार चलाकर,
हुंकार कर दे इस धरा पर,
छिपे हैं असुर जहाँ-जहाँ पर!
भारत माँ की धूमिल चीर,
फाड़कर भागे अपराधी फिर,
कब तक बनकर गूंगी-बहरी,
बेटियों को तू देखती रहेगी?

प्रसून नहीं, अब प्रस्तर बन,
अबला नहीं, तू शस्त्रधर बन!
सियार-श्रृंगालों पर वार कर,
नित-नित तू प्रहार कर!
समाज के इस पृष्ठ पर,
प्रश्न खड़ा है अब तक,
पूछती हैं देश की बेटियाँ,
आखिर कब तक, आखिर कब तक...?

- अमरजीत कुमार 
पता - आरा, भोजपुर

1 टिप्पणियाँ

  1. आज के समय में स्त्रियों के दयनीय स्थिति का अत्यंत मार्मिक वर्णन और बदलाव लाने को प्रेरित करता नवगीत अत्यंत सुंदर है
    आपको बहुत बहुत बधाई 👏

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