चूक की हुक! (छंद) - विद्यावाचस्पति अजय कुमार झा



कुछ हमें छोड़कर चले गए, कुछ को हमने भी छोड़ दिया।
कुछ पद को पाकर मस्त हुए, हमको पद-अहम ने तोड़ दिया।। १

फिर क्षणभंगुरता के कारण, कुछ यहाँ लड़े कुछ वहाँ गिरे।
कुछ गिर-गिरकर भी संभल गए, कुछ गिरे तो गिरते चले गए।। २

न होश जगा नहीं बोध जगा, जो हवा के रुख को है जाने।
क्या उबल रहा जन-हृदय में, मद-अंध कहो क्यों पहचाने।। ३

बस यही एक है चूक बड़ी, वटवृक्ष भी छाया दे न सका।
आपस में ईर्ष्या-द्वेष बढ़ी, आशीष समाज का ले न सका।। ४

मनबंध जहाँ संबंध वहीं, अनुबंध के संग प्रतिबंध भी है।
जुड़ना-टूटना तो स्वाभाविक है, प्रतिबंध के संग संबंध भी है।। ५

अब तोड़ के सब प्रतिबंधों को, मनबंध बढ़े, संबंध बढ़े।
सारे शिकवों को छोड़-छाड़, संग चलने का अनुबंध करें।। ६

जो समझ गए इन पंक्तियों को, उनको हृदय से नमन करूँ।
जो मनन करे इन उक्तियों को, कह साधुवाद मैं गमन करूँ।। ७

विद्यावाचस्पति अजय कुमार झा
प्राचार्य: RBM कॉलेज, जलेश्वर, नेपाल

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