हिंदी साहित्य का इतिहास जब भी करवट लेता है, उसमें सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' (1911-1987) का नाम एक मील के पत्थर की तरह चमकता है। अज्ञेय जी केवल एक कवि नहीं थे; वे एक प्रखर उपन्यासकार, निबंधकार, पत्रकार और सबसे बढ़कर एक महान संपादक थे, जिन्होंने 'तार सप्तक' के माध्यम से हिंदी कविता को पारंपरिक ढांचों से मुक्त कर एक नया आकाश दिया।
उनकी कविताओं में व्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रकृति के प्रति गहरा अनुराग और शब्दों के पीछे छिपे 'मौन' की गूंज सुनाई देती है। आइए, आज उनके इसी अनूठे रचना-संसार में उतरते हैं।
अज्ञेय जी का मानना था कि जो बात शब्द नहीं कह पाते, वह मौन कह देता है। वे भाषा के अति-प्रयोग के विरोधी थे और कम से कम शब्दों में ब्रह्मांड की गहरी बात कह जाने के हुनरमंद थे।
पंक्तियाँ:
मौन भी व्यंजना है:
जितना तुम्हारा सच है, उतना ही कहो;
तुमने मौन रहकर भी जो कुछ कहा,
वह सब मैंने सुना।
भावार्थ: सत्य को बहुत सारे शब्दों के आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। जितना सच है, उसे उतनी ही सादगी से कहना चाहिए। कभी-कभी चुप्पी या मौन भी अपने आप में एक संपूर्ण अभिव्यक्ति (व्यंजना) बन जाता है, जिसे समझने के लिए संवेदनशील हृदय की आवश्यकता होती है।
अपनी प्रसिद्ध कविता 'नदी के द्वीप' में उन्होंने व्यक्ति (द्वीप) और समाज (नदी) के संबंधों को एक बेहद दार्शनिक और रूपकात्मक ढंग से परिभाषित किया है।
पंक्तियाँ:
हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल सब उसी के गढ़े हैं।
भावार्थ: मनुष्य इस समाज रूपी नदी में एक द्वीप की तरह है। हम समाज से अलग नहीं होना चाहते, क्योंकि इसी समाज (नदी) ने हमारे व्यक्तित्व को आकार, संस्कार और पहचान दी है। व्यक्ति की स्वतंत्रता समाज के भीतर रहकर ही सार्थक है।
अज्ञेय जी ने आधुनिक शहरी जीवन की बनावट और उसकी संवेदनहीनता पर बहुत तीखे और सूक्ष्म व्यंग्य भी किए हैं। उनकी कविता 'साँप' आज के शहरीकरण पर सबसे सटीक टिप्पणी है।
पंक्तियाँ:
साँप! तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया।
एक बात पूछूँ— (उत्तर दोगे?)
तब फिर डँसना कहाँ से सीखा—
विष कहाँ पाया?
भावार्थ: कवि आधुनिक 'सभ्य' कहे जाने वाले शहरी समाज पर चोट करते हुए कहते हैं कि जो सांप जंगलों में रहता है, उसने कभी छल-कपट नहीं सीखा। लेकिन शहरों में रहने वाले लोग, जो खुद को सभ्य कहते हैं, उनके भीतर इतना जहर और दूसरों को डसने की प्रवृत्ति कहाँ से आ गई?
'कितनी नावों में कितनी बार' जैसी अमर कृति के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित अज्ञेय जी को पढ़ना अपनी ही चेतना को और अधिक माँजना है। वे हमें सिखाते हैं कि परंपरा का सम्मान करते हुए भी नए प्रयोगों से डरना नहीं चाहिए। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही आधुनिक, प्रासंगिक और कालजयी हैं, जितनी आधी सदी पहले थीं।
साभार और संदर्भ सूची :
स्रोत ग्रंथ: अज्ञेय रचनावली, 'सदा नीरा' (कविताओं का संग्रह).
ऐतिहासिक संदर्भ: आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. नामवर सिंह के आलोचनात्मक लेख.
विशेष आभार: यह आलेख 'बोधायन पत्रिका' के मंच से आधुनिक हिंदी चेतना के इस महाशिल्पी 'अज्ञेय' के प्रति सादर साभार समर्पित है।