शाम ढल रही थी—
आँगन में धूप की आख़िरी रेखा
चुपचाप सिमट रही थी,
और उसी को थामे
एक छोटी-सी आवाज़
धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी—
“पापा…”
पिता ने अख़बार से नज़र उठाई,
जैसे समय ने उन्हें पुकारा हो—
“हाँ, बिटिया?”
बेटी ने अपनी आँखों में
पूरा आकाश भर लिया था,
वह बोली—
“पापा, जो भी करना…
ज़रा सोच-समझकर करना।”
पिता चौंके—
“क्या हुआ, मेरी बच्ची?”
वह पास आई,
अपने सपनों को दोनों हथेलियों में समेटे—
“मैं एक बेटी हूँ, पापा…
लेकिन सिर का बोझ नहीं हूँ।
मेरी हँसी को जल्दी-जल्दी
विदा मत कर देना…”
उसकी आवाज़ काँप गई—
जैसे किसी कली ने
हवा से डरकर
अपनी पंखुड़ियाँ समेट ली हों—
“अभी तो मैंने
इस रंगीन दुनिया को
ठीक से देखा ही कहाँ है…
अभी तो मैं
सपनों के अर्थ समझना सीख रही हूँ,
अभी तो मेरी आँखों में
इंद्रधनुष अधूरा है…”
पिता की उँगलियाँ
धीरे-धीरे काँपने लगीं—
अख़बार की ख़बरें
अब धुँधली हो चुकी थीं।
“पापा, मुझे उड़ना है—
उन्मुक्त आसमान में,
जहाँ मेरी पहचान
मेरे नाम से हो,
न कि किसी रिश्ते के बोझ से…”
उसने पापा का हाथ थाम लिया—
“मैं पढ़ना चाहती हूँ,
खुद को गढ़ना चाहती हूँ,
हर उस रास्ते पर चलना चाहती हूँ
जहाँ मेरे कदम
मेरे अपने हों…”
एक पल को
घर की दीवारें भी सुनने लगीं—
सन्नाटा जैसे
उसकी हर बात को
संभालकर रख लेना चाहता था।
“पापा, मुझे जल्दी मत कर देना…
मेरी उम्र को
किसी परंपरा की बेड़ियों में मत बाँध देना…
मैं भी जीना चाहती हूँ—
पूरी साँसों के साथ,
पूरे सपनों के साथ…”
पिता की आँखें
अब भीगी हुई थीं—
उन्होंने बेटी के सिर पर हाथ रखा,
जैसे वर्षों का बोझ
एक क्षण में उतर गया हो—
“तू बोझ नहीं है, बिटिया…
तू तो मेरी सबसे बड़ी पूँजी है,
मेरी सबसे सच्ची पहचान…”
बेटी मुस्कुराई—
उसकी मुस्कान में
एक पूरा आकाश खिल उठा—
और उस दिन
एक पिता ने
समाज से नहीं,
अपने भीतर के डर से लड़ना सीखा—
क्योंकि
एक बेटी ने कहा था—
“पापा… अभी मुझे उड़ना है।”
…………............................
- कैलाश केशरी
संपर्क:
बेटियाँ लेडीज़ कॉर्नर, धर्मस्थान रोड, दुमका (झारखंड)
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छंदमुक्त
यह कविता समाज की उस सोच पर करारा प्रहार करती है जो बेटियों को बोझ मानती है, जबकि एक बेटी उसके पिता के लिए सबसे बड़ी पूंजी होती है। इस कविता का सबसे सशक्त पहलू है कि एक पिता समाज का परवाह किए बिना अपने भीतर के रूढीवादि डर से लड़ना और जीतना सिखाती है। वास्तव में यह कविता पिता-पुत्री के भावनात्मक संवाद को दर्शाती है।
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