हिंदी कविता का इतिहास जहाँ से आकार लेना शुरू करता है, उस शुरुआती बिंदु पर जो सबसे बुलंद और स्पष्ट आवाज़ सुनाई देती है, वह है—सरहपाद की। सिद्ध साहित्य के प्रवर्तक और हिंदी के सबसे पहले कवियों में गिने जाने वाले सरहपाद (8वीं सदी) मूलतः 'सहज जीवन' और 'भीतरी शुद्धता' के पैरोकार थे। आज जब हम धर्म, समाज और जीवन में बाहरी दिखावे से घिरे हैं, तब सरहपाद की सदियों पुरानी वाणियाँ और उनके दोहे हमें जीवन का सबसे सच्चा आईना दिखाते हैं।
नीचे उनकी मूल विचारधारा को दर्शाते कुछ प्रमुख दोहे और उनकी सरल व्याख्या दी गई है,
1. बाहरी आडंबर और पाखंड पर प्रहार
सरहपाद ने उस दौर में भी जटा बढ़ाने, तिलक लगाने या केवल वेदों के रटने जैसे बाहरी दिखावों को पूरी तरह नकार दिया था। उनका मानना था कि सत्य भीतर है, बाहर नहीं।
दोहा:
ब्राह्मणहि न जाणन्तहि भेउ, एवई पढ़िअउ एउ चउवेउ।
मट्टी पाणि कुस लइ पढ़न्त, घरही बइसी अगि हुणन्त।।
भावार्थ: जो लोग केवल वेदों को रटते हैं, वे सत्य के भेद को नहीं जानते। मिट्टी, पानी और कुशा (घास) लेकर घर में बैठकर अग्नि में आहुति (हवन) देने मात्र से ईश्वर या ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, जब तक कि मन के भीतर का अज्ञान न मिटे।
2. सहज मार्ग और मन की शुद्धि
सरहपाद का पूरा दर्शन 'सहजयान' पर टिका है। सहज का अर्थ है—जो स्वाभाविक हो, जहाँ कोई बनावट न हो।
दोहा:
जहि मन पवन न संचरइ, रवि ससि नाहि पवेस।
तहि वट चित्त बिसाम करु, सरहें कहिउ उवेस।।
भावार्थ: सरहपाद उपदेश देते हुए कहते हैं कि जहाँ न मन की चंचलता पहुँचती है, न प्राणों (पवन) का भटकाव, और जहाँ सूर्य-चंद्रमा (संसार के द्वंद्व) भी प्रवेश नहीं कर पाते, उस शांत और सहज अवस्था में अपने चित्त को विश्राम दो। यही परम शांति का मार्ग है।
3. काया (शरीर) के भीतर ही तीर्थ
तीर्थ यात्राओं और बाहरी भटकाव पर चोट करते हुए वे कहते हैं कि सबसे बड़ा तीर्थ मनुष्य का अपना अंतःकरण है।
दोहा:
एथु से सुरसइ एथु सो गङ्गासागरु, एथु पआग बणारसि एथु सो चन्ददिवाहरू।*
खेत्तु उपक्खेत्तु मइँ भमइउ दीठा, अत्थ मज्झे सरिस वि कत्थ वि तीथा।।
भावार्थ: इसी शरीर और मन के भीतर सरस्वती है, यहीं गंगासागर है, और यहीं प्रयाग तथा बनारस हैं। मैंने बहुत से क्षेत्र और उप-क्षेत्र भटक कर देख लिए, लेकिन अपने आत्म-ज्ञान (मन के भीतर) से बढ़कर पवित्र और सुंदर तीर्थ मुझे कहीं और नहीं मिला।