तुम चाहते ही नहीं थे प्रेम करना,
तुम चाहते थे तपती धूप से बचना।
तुम चाहते ही नहीं थे प्रेम-पत्र लिखना,
तुम चाहते थे एक विख्यात रचना।
अगर तुम चाहते, तो हम मिल सकते थे,
हम दोनों एक ही दुनिया में रहते थे।
मैं धान के खेतों में रोपा लगाती,
तुम महुआ बीनकर लाते;
तुम मन के गीत गाते,
और मैं उन्हें चुपचाप सुनती जाती।
प्रेम में हम दोनों,
कितने सुंदर हो जाते!
-दोलन राय
नागपुर, महाराष्ट्र
भारत
बहुत ही सुंदर दिल को छू लेने वाली रचना!
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