बालक क्रीड़ा-स्थल नहीं यह, मृत्यु निकट अब आया है।
दुर्योधन कहता रण में अब, किसका तुझ पर साया है!
द्रोण, कृपा सब मौन खड़े हैं, भीष्म वचन से हारे हैं।
लड़ा निहत्था अभिमन्यु देख, अर्जुन, कृष्ण पुकारे हैं।
है धिक्कार उन्हें जो रण में, षड्यंत्रों से जीते हैं।
उन्हें तरस न आया बिल्कुल, संबंधों से रीते हैं।
सात-सात योद्धाओं ने मिल, इक बालक को मारा है।
सुने जगत प्रतिज्ञा अर्जुन की, जयद्रथ-वध उच्चारा है।
सांझ हुई भ्रम में जयद्रथ को, छल यह कुछ समझ न आया।
कृष्ण-कृपा से प्रण पूर्ण किया, अर्जुन सर काट गिराया।
महादेव का प्रण पूर्ण किया, अर्जुन ने जयद्रथ मारा।
रण में श्री कृष्णा मुस्काते, दुखियों का बनें सहारा।
धृतराष्ट्र के मोह ने यह, सब संग्राम रचाया है।
केशव के समझाने पर भी, जब वह समझ न पाया है।
चीर-हरण पर मौन साधना, जग को पड़ता है भारी।भीष्म पितामह जैसे योद्धा पर, शिखंडी पड़ा था भारी॥
— सूरज तिवारी
भदोही (उत्तर प्रदेश)