चुपचाप तड़पने का हुनर सीख रहा हूँ,
रो-रो के मैं हँसने का हुनर सीख रहा हूँ।
लहरों को उधर ज़िद है डुबोने की, इधर मैं
तूँफ़ाँ से उबरने का हुनर सीख रहा हूँ।
मुझसे हैं ख़फ़ा गर ये सितारे, तो गिला क्या?
क़िस्मत को बदलने का हुनर सीख रहा हूँ।
मख़मूर निगाहों का असर होने लगा है,
मैं इश्क़ में जलने का हुनर सीख रहा हूँ।
मुश्किल हो, अदावत हो या हो अपनी फ़क़ीरी,
हालात में ढलने का हुनर सीख रहा हूँ।
— रवि किशन कुमार
पटना, बिहार