अपने घर का सुख (लघुकथा) - सिद्धेश्वर

​“देख यार, मेरे काम से प्रभावित होकर अमेरिका की मेरी कंपनी ने मुझे प्रमोशन देते हुए वहाँ जाकर काम करने का ऑफ़र दिया है।”

​“अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है, शैलेश जी! ऑनलाइन काम करने वालों को ऐसा मौक़ा बहुत कम मिलता है। कुछ दिन पहले मेरे चचेरे भाई को भी ऐसा ही ऑफ़र मिला था, वह तो विदेश चला गया। अब तो तेरी मौज है—जा, विदेश में ख़ूब आनंद ले!”

​“नहीं यार, मैं अपने माँ-बाप और अपना घर-आँगन छोड़कर विदेश नहीं जा सकता। ऐसा प्रमोशन और ऐसा वेतन किस काम का, जो हमें अपने माता-पिता और घर-द्वार से दूर कर दे? मैं यह ऑफ़र ठुकरा रहा हूँ। अपने देश में ही रहकर काम करूँगा।”

​“तू तो सच में पागल है! ऐसा ऑफ़र किसी को आसानी से मिलता नहीं, और तुझे मिला है तो ठुकरा रहा है! अरे, अपने माँ-बाप की सेवा ही करनी है न? तो एक नहीं, दो नौकर रख दे जो उनकी सेवा-शुश्रूषा कर दें।”

​“मेरे जीते-जी मेरे माँ-बाप की सेवा कोई नौकर करेगा? कैसी बातें करता है तू! और कैसा ज़माना आ गया है! नौकर सेवा तो कर सकता है, पर बेटा नहीं बन सकता। जितना अपनापन और स्नेह मैं अपने माता-पिता को दे सकता हूँ, उतना कोई नौकर कभी नहीं दे सकता। विदेश में रुपया-पैसा तो मिल जाएगा, पर वहाँ माँ-बाप का प्यार और घर का सुख नहीं ख़रीदा जा सकता।”


​— सिद्धेश्वर

  पटना, बिहार 

संपर्क: 92347 60365



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