देहावसान पे रोया जिसके ज़ार-ज़ार जानी दुश्मन,
सभी दंग थे बोल उठा जब निलहा ज़ालिम -ए अमन—
"ऐसा जवाँमर्द जो मुझसे ले सकता सीधी टक्कर,
कहाँ मिलेगा हे प्रभु मेरे? श्रद्धासुमन! स्नेहवंदन!"
अभूत न भविष्यति, ऐसा था वह एकमात्र इतिहास-पुरुष,
कर दिए आत्मबल से जिसने जन-मानस के सब दूर कलुष।
अद्भुत चंपामय चम्पारण का धीरोदात्त नीलनायक,
समवाय-समन्वय का चेता सदियों में मिला लोकनायक।
जिसके बलबूते बापू ने ईश्वर का साक्षात्कार किया,
चम्पारण से नाम महात्मा पा हार्दिक आभार किया।
निलहे अत्याचारों से जब भीत-त्रस्त चम्पारण था,
धरती के अन्नदाता का पीड़ित जब तन-मन था।
पंडित राजकुमार शुक्ल ने ली बटोर सारी ऊर्जा,
प्रतिफलन, तीन दशकों में टूटा म्लेच्छों का पुर्ज़ा-पुर्ज़ा।
विप्लवी त्रिमूर्ति की गाथा तो ऐतिहासिक अध्याय बनी,
कायर जब ज़ुल्मी निलहों से धीरों-वीरों की रार ठनी।
निलहे म्लेच्छों के माथे थे असह्य जो भार,
शीतल राय, गुलाब शेख संग पंडित राजकुमार,
सिखलाकर संगठन-मंत्र की महिमा इन वीरों ने,
चम्पारण की धरती से किया आत्मशक्ति विस्तार।
बाबू ब्रजकिशोर, रामनवमी बाबू का साहचर्य,
पीर मुहम्मद मूनिस-से पत्रकार आए साभार।
प्रथम प्रयोगशाला बापू की चम्पारण में ख्यात हुई,
आज़ादी के आंदोलन की ऐतिहासिक शुरुआत हुई।
असहयोग, सत्याग्रह, खादी, बुनियादी तालीम,
कड़वे मगर सदा गुणकारी निकले जैसे नीम।
बनी प्रयोगशाला द्वितीय बापू की चम्पारण में,
चम्पारण के गाँधी ने रखी नींव वृन्दावन में।
गाँधी-राजेंद्र-त्रिमूर्ति ज़ाकिर का वर्धा-बुनियादी सपना,
साकार प्रजापति मिश्र ने किया वृन्दावन में अपना।
कुँवरबाग में उत्तर-बुनियादी विद्यालय प्रकरण,
ऐतिहासिक मील का पत्थर, जो नहीं बिसरता चम्पारण।
बुनियादी शिक्षा ने भारत को अद्भुत हैं रत्न दिए,
मूल्यांकन है शेष, उन्होंने अब तक कितने यत्न किए!
— नन्दकुमार आदित्य