संभल-संभलकर पाँव रखो तुम(कविता) - जया सिंह

डगर हो चाहे जितनी मुश्किल,
चट्टानों-सा अड़ना सीखो।
आफ़ताब-सा जलना सीखो,
जग को रोशन करना सीखो।

निर्झर जैसे लड़ना सीखो,
और नदी-सा बढ़ना सीखो।
विचलित हो तो ज़रा ठहर लो,
फिर शक्ति मन भरना सीखो।

सबसे सुंदर भाव रखो तुम,
निर्मल-अचल स्वभाव रखो तुम।
हैं दुर्गम जीवन की राहें,
संभल-संभलकर पाँव रखो तुम।


— जया सिंह
बक्सर (बिहार)

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