काशफूल (छंदमुक्त) - ममता तिवारी 'मृदुला'

बरखा बच्ची थी तब भी प्यारी थी,
मिट्टी-धूल की सौंधी महक से लिपटी।
काली घटाओं के केश में लाल-पीले अमलतास, हरसिंगार के फूल सजाए,
रुनझुन-रुनझुन, रिमझिम-रिमझिम करती,
चहुँ ओर नाच-नाचकर
बूँद-बूँद बिखर रही थी।
बरखा-रानी तरुणी हुई,
तब भी सुंदर थी।
धरा को हरित मखमली चादर से ढक,
खुद रूपहली झीनी मोतियों की लड़ियों-गुंथी लहँगे पहने,
दिव्य देवांगना-सी मंद-मदिर मुस्काती...
विद्युत की करधनी बाँधे,
अमृत-कलश से जल छलकाती,
धरती का श्रृंगार करती...
दहकती, लहकती, लपकती चलती रही।
बरखा अब बूढ़ी होकर भी अनिंद्य सौंदर्य लपेटे,
अपनी विराट सुषमा को समेटती...
हल्की-हल्की हवाओं के झोंकों में
हौले-हौले हिलते-उड़ते
अपने श्वेत हो चुके केशों को बिखराए... संपूर्ण भूतल में खिलखिलाती घूम रही है।
अब बिदाई की बेला आ गई है,
बरखा बिदाई माँग रही है...
खुले श्वेत केश लहरा रहे हैं...
काश! बरखा रुक जाती... नहीं, नहीं रुकेगी... ऋतु की रानी लेने आई है... छोड़ जाएगी शरद-सुंदरी को...
बरखा काश! तुम रुक पातीं...
बरखा कहते हुए जा रही है—
"अरे! काश! काश नहीं करो...
लो... मैं जा रही हूँ छोड़कर अपने श्वेत बालों को,
काश के ये फूल बनकर मंद मलय में लहराते रहेंगे..."


— ममता तिवारी 'मृदुला'


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