सलाखों के पीछे(कहानी) - बैतुल्लाह अंसारी

खालिद बचपन से ही होनहार, सलीकेमंद और खामोश-सा लड़का था, जिसकी आँखों में सवाल थे। स्कूल के ज़माने से ही उसके अंदर एक अजीब-सी क़यादत (नेतृत्व) थी। वह दूसरों के लिए बोलता था। जहाँ कोई कमज़ोर दबता, खालिद की आवाज़ बुलंद हो जाती। यह उसके खून में था—गरीब की आवाज़ बनना, मज़लूम का सहारा बनना।
कॉलेज आया तो उसके इर्द-गिर्द सरज़िल, जावेद, अख़लाक़, राशिद, विकास और नेहा जैसे दोस्त जमा हो गए। सब उसी की राह पर चल पड़े। खालिद सबके जज़्बात का ख़्याल रखता—दोस्तों का भी, और कॉलेज के उन तमाम चेहरों का भी जिन्हें कोई नहीं पूछता था।
फिर इलेक्शन आया। तुल्बा (छात्रों) ने उसे अपना रहनुमा चुना। वह उनकी बातें एडमिनिस्ट्रेशन (प्रशासन) के सामने रखता, मसले हल कराता। लेकिन जब तुल्बा की आवाज़ें दबाई जाने लगीं, तो खालिद ने अपनी आवाज़ और बुलंद कर दी।
और यही उसका जुर्म बन गया।
हुकूमत-ए-वक़्त को इंसाफ़ की यह आवाज़ अच्छी न लगी। न उसने किसी का खून किया था, न किसी को मारा था। उस पर कोई इल्ज़ाम न था—सिवाय इसके कि वह सच बोलता था। उसे उठा लिया गया, हरासाँ (प्रताड़ित) किया गया और फिर सलाखों के पीछे डाल दिया गया।
आज भी वह जेल की सलाखों के पीछे है।
उसकी आवाज़ अब दीवारों से टकराकर लौट आती है। ज़िंदान (कैदखाने) की कोठरी में कीड़े-मकोड़ों का रेंगना, एक ही बैतुल-ख़ला (शौचालय) को सबके साथ साझा करना, बाथरूम के लिए लंबी क़तार, कैदियों में रोज़-रोज़ का लड़ना-झगड़ना... यह सब अब उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी है।
दिन में तीन बार क़तार में लगकर खाना लेना पड़ता है। सुबह नौ बजे से सबको किसी न किसी काम में लगा दिया जाता है। खालिद भी खामोशी से अपना काम करता रहता है। थक जाता है, तो दीवार के साए में बैठकर सुस्ता लेता है।
जेलर की, वार्डन की, हर किसी की कड़ी नज़र उस पर रहती है। सब उसे शक की निगाह से देखते हैं; जैसे डरते हों कि कहीं वह जेल के अंदर भी बग़ावत न कर दे।
लेकिन खालिद मुफ़क्किर (विचारक) है। जब फुर्सत मिलती है, तो वह पुराना अख़बार माँगकर पढ़ता है, कुछ न कुछ कागज़ के टुकड़ों पर लिखता रहता है। उसके दिमाग में हर वक़्त कुछ न कुछ चलता रहता है... अपनों के बारे में, देश के बारे में, गरीबों के बारे में और उन मज़लूमों के बारे में जिनकी आवाज़ वह बनना चाहता था।
वह जेल के हर कोने से वाक़िफ़ हो चुका है। उसकी कोठरी में रेंगने वाले कीड़े अब उसे मेहमान लगते हैं। वह धूप में, बारिश में, ठंड में जीने का आदी हो गया है। गर्मी में कोठरी तंदूर बन जाती है, जिस्म जल उठता है, फिर भी वह खुद को एडजस्ट कर लेता है। जाड़े में एक ही पतले कंबल में सिकुड़कर वह ठंड गुज़ार लेता है।
रोज़ का मामूल (दिनचर्या) वही है—सहन में काम, क़तार में खाना, शाम को गिनती, और फिर अपनी अंधेरी कोठरी में वापसी।
लेकिन हर शाम जब वह अपनी कोठरी में लौटता है, तो उसकी आँखों में एक ही उम्मीद रोशन होती है... कि एक दिन वह बेगुनाह साबित होगा। ये सलाखें टूटेंगी और वह फिर 'सलाखों के पीछे' से बाहर जाएगा—उन्हीं गलियों में, उन्हीं लोगों के बीच, उनकी आवाज़ बनकर।
क्योंकि सलाखें जिस्म को कैद कर सकती हैं, सोच को नहीं।

-बैतुल्लाह अंसारी

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका