रंग-बिरंगे मुखौटों में, जब जात का मंत्र फुँकाएगा,
अस्पताल की वह साँस भी, इलेक्शन का दाम चुकाएगा।
यहाँ 'कलम' झुकी है 'कुर्सी' पर, और 'डिग्री' नीलाम हुई,
'रोटी' की जो आँच थी साहब, 'नारों' में गुमनाम हुई!
'चूल्हा' तो ठंडा ही रहा, पर 'आग' दिलों में जला गए,
तुम 'बस्ती' के बाशिंदे थे, वह 'वोट-बैंक' बना गए।
'दवा' न मिली 'बीमार' को, 'मज़हब' का इलाज लिखा,
'अँधियारे' की उस रात का, बस 'कुर्सी' पर साज़ लिखा!
'सड़क' वही है, 'धूल' वही है, बस 'चेहरे' नए नक़ाबों में,
'विकास' तो बस अटका है, मंत्रियों के हिसाबों में।
'सवाल' अगर पूछोगे उनसे, 'जात' का ढाँचा लाएँगे,
तुम 'मुद्दों' पर अड़े रहे, तो वह 'दंगे' करवाएँगे!
तोड़ो यह मायाजाल अब, जागो ऐ नागरिक-इंसान!
'शिक्षा' और 'स्वास्थ्य' ही होगा, नए भारत का अभिमान!
- सुशील कुमार
सीतामढ़ी , बिहार