​हिन्दी की व्यथा (कविता) - जितेंद्र झा आजाद

घर के बाहर मान-मर्यादा, हर जुबाँ पे अब चढ़ आई,
अपने ही भारत-भूमि पर, जैसे लगती हूँ मैं पराई!

अपने ही समझते गैर मुझे, जैसे गैरों के घर आई,
जबकि मैंने अपने घर में, गैरों की प्रीत सदा अपनाई।

दुनिया में नहीं कोई भाषा, नहीं वाणी में माधुर्य इतना,
न रस, छंद, न अलंकार, नहीं शब्दों में वर्तनी इतनी!

क्यों नहीं अपनाई गई, क्या कमी मुझमें है कोई?
अपनों से हूँ उपेक्षित, क्यों दर्द नहीं समझ पाया कोई?

संस्कृत मेरी जननी है, मैं हिन्दी उसकी बेटी हूँ,
मुझको अपना लो हे भारत! मैं आस लगाए बैठी हूँ।


— जितेंद्र झा 'आजाद'
     सीतामढ़ी (बिहार)

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