टूटे दर्पण की छवि अगणित, प्रेयसि! खंडित उपहार न दो,
अंजलि-अंजलि फूल सहज दो, विगलित अंबुज-गलहार न दो।
संतरणी न फँसे भँवर विच, विचलित मन को मंझधार न दो,
शशि के वलय-सृजित अलकों को, सौरभ का अतिभार न दो।
टूटे दर्पण...
अभ्र-रहित आनन की आभा, कुंतल-घन-दल अभिसार न दो,
मिलन-गीत गा रहे अधर को, विरहाकुल प्रति-झंकार न दो।
पनिहारिन पनघट पर आए, इस प्यासे मन को इनकार न दो,
अंतस में रोपित पादप हित, तुम रीते घट का उद्गार न दो।
टूटे दर्पण...
प्रियतम ढूँढ़ रहे व्याकुल को, चितवन-चितचोरी धार न दो,
कोकिल के क्रंदन-स्वर उभरे, पायल-ध्वनि का परिहार न दो।
दीपशिखा-सम जलो उज्ज्वले, पर कज्जल का श्रृंगार न दो,
यह जीवन दो पल का शलभी, क्षणभंगुर जीवन-सार न दो।
टूटे दर्पण...
उड़ता पंछी उड़ने को आतुर, संत्रासी पिंजर-आगार न दो,
तुम निदान दो या न दो, पर निष्ठुर उच्चश्रृंखल आचार न दो।
प्रेम-पथिक कब विपणन-पंथी? तुम यायावर व्यापार न दो,
आश्वासन की संभीति मुकरी, तुम नभ-पुष्पों का हार न दो।
टूटे दर्पण...
कर सकती हो यदि अभिसारिन! दग्ध हृदय शीतित कर दो,
उद्दीपित मन, उन्मीलित तन, यह परिधानी अवगुंठन तज दो।
नीर-क्षीर हिम पिघले संयम, छुअन है शीतित, तापित कर दो,
उभय समर्पण, नो लक्ष्मणरेखा, मधु-विलयन को चर्चित कर दो!
टूटे दर्पण...
— चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा 'अकिंचन'
गोरखपुर
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