राष्ट्रकवि : दिनकर (कविता) - अतुल रॉय

'हुंकार', 'उर्वशी', 'रश्मिरथी',
'संस्कृति के चार अध्याय',
लिखे 'रेणुका', 'कुरुक्षेत्र',
वह 'राष्ट्रकवि' कहलाए!

तेईस सितंबर उन्नीस सौ आठ
को लोकधरा पर आए,
गाँव का नाम सिमरिया था
और ज़िला था बेगूसराय!

'मनरूप' माता, पिता 'रवि'
के थे प्यारे संतान,
'श्यामवती' पत्नी उनकी,
थे मिले कई सम्मान!

'ज्ञानपीठ', 'साहित्य अकादमी',
'पद्मभूषण' सम्मानित,
सौम्य, सरल थे, मृदुभाषी,
बस चाहें सबका हित।

"युग के सचमुच सूर्य थे दिनकर"—
कहा 'नामवर सिंह' ने!
"क्रांतिकारी आंदोलन का स्वर"—
बोला 'बेनीपुरी' ने!

लोकहित-साहित्य लिखे,
जन-जन के सब अधिकार,
चौबीस अप्रैल उन्नीस सौ चौहत्तर
छोड़ चले संसार।

धन्य हुई यह धरा, हाँ! ऐसे
पौरुष को जन्माकर,
'अतुल' करे यशगान चरण में,
अपना शीश झुकाकर!


— अतुल रॉय

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