बाबा की बगिया को देखो,
कैसे-कैसे खिलते फूल!
क्या कह दी कानों में तितली,
हँसते-हँसते मिलते फूल!
पी ली कितना मधु-पराग वह,
पूछ न लेना मुझसे भूल।
क्या कभी इनकार किया है,
बोलो, इस बगिया के फूल?
सुनो-सुनो, ओ मेरे भाई!
इन फूलों की राम-कहानी,
क्या उनसे चिड़िया बतियाई,
समझ गई फूलों की रानी!
— डॉ. सतीश चन्द्र भगत
बनौली, दरभंगा (बिहार) - 847428
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